मधुबनी, बिहार। मधुबनी जिले के ऐतिहासिक बलिराजगढ़ में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा चल रहे वैज्ञानिक उत्खनन कार्य में प्राचीन सभ्यता से जुड़े कई महत्वपूर्ण साक्ष्य सामने आए हैं। शनिवार को जिलाधिकारी आनंद शर्मा ने वर्चुअल माध्यम से उत्खनन कार्य की प्रगति की समीक्षा करते हुए संबंधित अधिकारियों को वैज्ञानिक मानकों के अनुरूप गुणवत्ता के साथ निर्धारित समय-सीमा में कार्य आगे बढ़ाने के निर्देश दिए।
समीक्षा बैठक में उत्खनन की वर्तमान स्थिति, अब तक प्राप्त पुरातात्विक अवशेषों तथा आगामी कार्ययोजना पर विस्तार से चर्चा की गई। जिलाधिकारी ने कहा कि बलिराजगढ़ केवल बिहार ही नहीं, बल्कि पूरे देश की महत्वपूर्ण पुरातात्विक धरोहर है। यहां हो रही वैज्ञानिक खुदाई मिथिला की प्राचीन सभ्यता, सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक विकास से जुड़े कई महत्वपूर्ण तथ्यों को उजागर कर रही है।
उन्होंने कहा कि उत्खनन कार्य पूरी वैज्ञानिक पद्धति और निर्धारित गुणवत्ता मानकों के अनुरूप किया जाए, ताकि इस ऐतिहासिक धरोहर का संरक्षण भी सुनिश्चित हो और शोध कार्य भी प्रभावी ढंग से आगे बढ़ सके।
ASI द्वारा संरक्षित है बलिराजगढ़
बाबूबरही प्रखंड की भूपट्टी और पचरुखी पंचायत की सीमा में स्थित बलिराजगढ़ को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित स्मारक क्षेत्र घोषित किया गया है। वर्तमान में यहां चरणबद्ध तरीके से वैज्ञानिक उत्खनन किया जा रहा है, जिससे मिथिला के प्राचीन इतिहास के कई अनसुलझे अध्यायों के सामने आने की संभावना जताई जा रही है।
छह ट्रेंच में जारी है वैज्ञानिक खुदाई
वर्तमान चरण में कुल छह ट्रेंच (खाइयों) में उत्खनन कार्य चल रहा है। इनमें तीन ट्रेंच किलेबंदी क्षेत्र में तथा तीन ट्रेंच किले की दक्षिण दिशा में लगभग 200 मीटर दूरी पर स्थित क्षेत्र में बनाए गए हैं।
किलेबंदी क्षेत्र की खुदाई के दौरान प्राचीन ईंटों से निर्मित विशाल परकोटे (Fortification Wall) और प्राचीन फर्श के अवशेष मिले हैं। इसके अलावा पत्थर के गोले, मिट्टी के बर्तन और नॉर्दर्न ब्लैक पॉलिश्ड वेयर (NBPW) सहित कई महत्वपूर्ण पुरावशेष प्राप्त हुए हैं, जो उस समय की विकसित नगरीय संस्कृति की ओर संकेत करते हैं।
रिंग वेल और प्राचीन जल निकासी प्रणाली का अनावरण
दक्षिणी क्षेत्र के एक ट्रेंच में लगभग 5.40 मीटर गहराई तक खुदाई के दौरान 13 परतों वाला रिंग वेल (Ring Well) मिला है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसका उपयोग जल संग्रहण, अन्न भंडारण या घरेलू जरूरतों के लिए किया जाता रहा होगा।
यहीं से मानव और पशु आकृतियों की टेराकोटा प्रतिमाएं, खिलौना गाड़ी, मनके, स्लिंग बॉल, ब्लैक स्लिप्ड वेयर सहित कई अन्य महत्वपूर्ण पुरावशेष भी प्राप्त हुए हैं।
एक अन्य ट्रेंच में प्राचीन जल निकासी प्रणाली (Drainage System) और सोख्ता गड्ढा (Soak Pit) भी मिला है। यहां से मुहरें, सीलिंग, टेराकोटा मानव एवं पशु प्रतिमाएं, मनके, पत्थर तथा टेराकोटा स्लिंग बॉल सहित कई ऐतिहासिक सामग्री बरामद हुई है।
पांच प्रकार के प्राचीन मृदभांड मिले
उत्खनन के दौरान रेड वेयर, ब्लैक वेयर, ब्लैक स्लिप्ड वेयर, ग्रे वेयर और नॉर्दर्न ब्लैक पॉलिश्ड वेयर (NBPW) जैसी पांच अलग-अलग मृदभांड परंपराओं के साक्ष्य मिले हैं। पुरातत्व विशेषज्ञों के अनुसार यह इस क्षेत्र में विभिन्न सांस्कृतिक कालखंडों में निरंतर मानव बसावट का मजबूत प्रमाण है।
इसके अलावा एक अन्य ट्रेंच में सात परतों वाली ईंट निर्मित संरचना भी मिली है, जिसकी लंबाई लगभग 3.80 मीटर और चौड़ाई 2.60 मीटर बताई गई है।
तीन हजार वर्ष पुरानी विकसित नगरी होने के मिले संकेत
पुरातत्वविदों के अनुसार बलिराजगढ़ से प्राप्त प्रारंभिक सांस्कृतिक साक्ष्य लगभग छठी शताब्दी ईसा पूर्व तक के हैं। अब तक प्राप्त विशाल किलेबंदी, रिंग वेल, उन्नत जल निकासी व्यवस्था, ईंट निर्मित स्थापत्य, मुहरें, टेराकोटा प्रतिमाएं और विभिन्न प्रकार के मृदभांड इस बात के मजबूत संकेत देते हैं कि यह क्षेत्र लौह युग से प्रारंभिक ऐतिहासिक काल तक लगभग एक हजार वर्षों तक आबाद रहा एक सुव्यवस्थित और समृद्ध शहरी केंद्र था।
जिला प्रशासन का मानना है कि बलिराजगढ़ में जारी यह उत्खनन मिथिला के गौरवशाली इतिहास को नई पहचान देने के साथ-साथ राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस ऐतिहासिक धरोहर को नई प्रतिष्ठा दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित होगा।
