शराब तस्करी के आरोप में नेहा झा की गिरफ्तारी के बाद सोशल मीडिया पर तरह-तरह की पोस्ट और टिप्पणियां सामने आ रही हैं। कई जगह मामले को सनसनीखेज अंदाज में प्रस्तुत किया जा रहा है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक जरूरी सवाल पीछे छूटता नजर आ रहा है—आखिर एक पढ़ी-लिखी युवती को कथित तौर पर इस अवैध कारोबार से जुड़ने की जरूरत क्यों पड़ी?
बताया जा रहा है कि नेहा झा स्नातक हैं और उनके मन में आगे पढ़ाई करने तथा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर प्रशासनिक सेवा में जाने के सपने थे। ऐसे में यह जानना भी जरूरी है कि आखिर वे परिस्थितियां क्या थीं, जिनके कारण उन्होंने अपने सपनों से अलग रास्ता चुना।
यह सवाल किसी आरोपी को उसके कथित अपराध से मुक्त करने के लिए नहीं है। कानून अपना काम करेगा और यदि आरोप साबित होते हैं तो उसके अनुसार कार्रवाई भी होगी। लेकिन किसी मामले की रिपोर्टिंग करते समय उस व्यक्ति की पूरी जिंदगी को केवल एक घटना या आरोप तक सीमित कर देना भी उचित नहीं है।
किसी भी महिला के बारे में उसकी शक्ल-सूरत या व्यक्तिगत जीवन को केंद्र में रखकर टिप्पणियां करना पत्रकारिता की गंभीरता के अनुरूप नहीं है। किसी को ‘हुस्न की मल्लिका’ या इस तरह के दूसरे विशेषणों से संबोधित करने के बजाय यह जानने की कोशिश होनी चाहिए कि उसके पीछे की वास्तविक कहानी क्या है।
यदि कोई युवती आर्थिक या पारिवारिक दबाव, रोजगार की कमी, गलत संगत, किसी के प्रभाव या किसी अन्य परिस्थिति के कारण अपराध की दुनिया में पहुंची है, तो उन परिस्थितियों को समझना भी समाज और पत्रकारिता की जिम्मेदारी है। हालांकि, ऐसी किसी वजह की पुष्टि बिना संबंधित व्यक्ति से बात किए या विश्वसनीय तथ्यों के आधार पर किए बिना नहीं की जानी चाहिए।
शराबबंदी वाले बिहार में अवैध शराब का कारोबार लंबे समय से गंभीर चुनौती रहा है। ऐसे मामलों में सिर्फ छोटे स्तर पर पकड़े गए आरोपियों को लेकर सनसनी पैदा करने के बजाय पूरे नेटवर्क, आपूर्ति श्रृंखला और इसके पीछे मौजूद लोगों की भूमिका की भी पड़ताल जरूरी है।
नेहा झा के मामले में भी सवाल सिर्फ इतना नहीं होना चाहिए कि वे कथित तौर पर शराब की तस्करी में कैसे पकड़ी गईं। सवाल यह भी होना चाहिए कि उनकी कहानी क्या है, उनकी परिस्थितियां क्या थीं और वे इस रास्ते तक कैसे पहुंचीं?
पत्रकारिता का उद्देश्य केवल किसी व्यक्ति को खबर का चेहरा बनाना नहीं, बल्कि खबर के पीछे छिपे तथ्यों और परिस्थितियों को सामने लाना भी है।
इसलिए बेहतर होगा कि मामले को केवल सनसनी के रूप में देखने के बजाय नेहा झा का पक्ष भी सुना जाए। उनसे पूछा जाए कि उनकी शिक्षा, उनके सपने और उनके वर्तमान हालात के बीच इतना बड़ा अंतर कैसे आया।
कानून अपना काम करे, लेकिन खबर के साथ इंसानियत और जिम्मेदार पत्रकारिता भी बनी रहनी चाहिए। किसी आरोप में गिरफ्तारी किसी व्यक्ति की पूरी जिंदगी का अंतिम परिचय नहीं हो सकती।
