अपराधी की कोई जाति नहीं होती” — यह बात सुनने में जितनी सही लगती है, धरातल पर मीडिया और समाज का रवैया उतना ही पक्षपातपूर्ण दिखाई देता है।
जमुई मामले में मीडिया और सोशल मीडिया पर एक खास नरेटिव और जातिगत कोण को उभारने की पूरी कोशिश की गई। इसके बावजूद, समाज के सभी वर्गों ने बिना किसी पूर्वाग्रह के उस अपराध की कड़े शब्दों में निंदा की।
दूसरी ओर, समस्तीपुर (कर्पूरीग्राम) में नाबालिग लड़की के साथ हुई बदसलूकी के मामले में पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए 6 घंटे के भीतर सभी 4 अभियुक्तों (विकास कुमार, राहुल कुमार, रामबाबू सहनी और अवधेश पासवान) को गिरफ्तार कर लिया। लेकिन बड़े न्यूज़ चैनलों पर इस घटना को लेकर वैसी सक्रियता या चर्चा देखने को नहीं मिल रही है।
जब तक हम अपराध को जाति के चश्मे से देखते रहेंगे, तब तक निष्पक्ष न्याय की उम्मीद नहीं की जा सकती।
एक घटना पर हंगामा करना और वैसी ही दूसरी घटना पर मौन साध लेना अपराधियों के हौसले बढ़ाता है। इसका खामियाजा अंततः बहुजन (OBC, SC, ST) और शोषित समाज की बेटियों को ही भुगतना पड़ता है।
सोशल मीडिया के इस दौर में हमें यह समझना होगा कि अपराध केवल अपराध है।अगर हम आज मीडिया और समाज के इस दोहरे रवैये के खिलाफ एकजुट होकर आवाज नहीं उठाएंगे, तो आने वाले समय में स्थितियां और अधिक गंभीर होंगी।
