दीपावली का त्योहार नजदीक आते ही बाजारों में रौनक बढ़ने लगी है। घरों और दुकानों को सजाने के लिए रंग-बिरंगी लाइटों और इलेक्ट्रॉनिक झालरों की खरीदारी भी तेज हो गई है। लेकिन इस बदलते बाजार का असर उन पारंपरिक कारीगरों पर पड़ रहा है, जो पीढ़ियों से मिट्टी के दीये बनाकर लोगों के घरों को रोशन करते आए हैं। बिहार के कटिहार जिले के कुरसेला में कुम्हारों के सामने इस बार भी रोजी-रोटी का संकट खड़ा होता दिखाई दे रहा है। चाइनीज झालरों और इलेक्ट्रॉनिक बल्बों के बढ़ते चलन ने मिट्टी के दीयों की मांग को काफी प्रभावित किया है।
कुरसेला हाट सहित आसपास के बाजारों में इस समय रंग-बिरंगी झालरों और बिजली से चलने वाले सजावटी सामान की दुकानें सजी हुई हैं। दूसरी ओर, मिट्टी के दीये बनाने वाले कारीगर ग्राहकों का इंतजार कर रहे हैं। कभी दीपावली से कई सप्ताह पहले ही इनके पास दीयों के बड़े-बड़े ऑर्डर आ जाया करते थे, लेकिन अब पहले जैसी मांग नहीं रह गई है।
स्थानीय कारीगरों के मुताबिक, कुछ साल पहले तक बड़े घरों और दुकानदारों की ओर से 500 से लेकर 1000 दीयों तक के ऑर्डर पहले ही मिल जाते थे। इससे उन्हें त्योहार से पहले ही अच्छी कमाई की उम्मीद बंध जाती थी। लेकिन अब स्थिति बदल गई है। लोग पूजा-पाठ के लिए केवल चार-पांच मिट्टी के दीये खरीदते हैं, जबकि घर की सजावट के लिए इलेक्ट्रॉनिक झालरों और रंगीन बल्बों को प्राथमिकता देते हैं।
कटिहार के दक्षिणी मुरादपुर पंचायत के तीनघड़िया गांव के रहने वाले बलराम पंडित, अर्जुन पंडित, छोटेलाल पंडित और दिनेश पंडित जैसे कारीगर इस बदलते बाजार से परेशान हैं। इनका कहना है कि मिट्टी के दीये बनाने में मेहनत के साथ समय और संसाधन भी काफी लगते हैं। मिट्टी जुटाने से लेकर दीये तैयार करने और उन्हें पकाने तक कई प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। इसके बावजूद बाजार में उचित कीमत नहीं मिलती।
कुम्हारों की परेशानी केवल दीयों की घटती मांग तक सीमित नहीं है। मिट्टी की उपलब्धता में कमी और लगातार बढ़ती लागत ने भी उनके कारोबार को प्रभावित किया है। ऐसे में परिवार का खर्च चलाना मुश्किल होता जा रहा है। हालात यह हैं कि नई पीढ़ी के कई युवा इस पुश्तैनी काम को छोड़कर दूसरे राज्यों में रोजगार की तलाश में जाने को मजबूर हो रहे हैं।
दरअसल, मिट्टी के दीये भारतीय संस्कृति और परंपरा का अहम हिस्सा हैं। दीपावली पर दीया जलाने की परंपरा सदियों पुरानी है। मिट्टी से बने दीये स्थानीय कारीगरों की मेहनत और पारंपरिक कला को भी जीवित रखते हैं। इसके बावजूद आधुनिक सजावटी उत्पादों की बढ़ती लोकप्रियता के कारण पारंपरिक मिट्टी के उत्पाद बाजार में पीछे छूटते दिखाई दे रहे हैं।
वहीं, पर्यावरण के लिहाज से भी मिट्टी के दीयों को बेहतर विकल्प माना जाता है। इलेक्ट्रॉनिक सजावटी लाइटों के खराब होने पर ई-कचरा पैदा होता है, जबकि मिट्टी के दीये प्राकृतिक सामग्री से तैयार किए जाते हैं। ऐसे में स्थानीय कुम्हारों का कहना है कि यदि लोग दीपावली पर मिट्टी के दीयों की खरीदारी को प्राथमिकता दें, तो इससे उनकी आजीविका को सहारा मिल सकता है।
कारीगरों ने सरकार से भी मदद की मांग की है। उनका कहना है कि जिस तरह रेलवे स्टेशनों पर कुल्हड़ के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की पहल की गई थी, उसी तरह मिट्टी के दीये और अन्य पारंपरिक उत्पादों को भी प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। इसके लिए कुम्हार कला बोर्ड की पहल, सरकारी योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन और स्थानीय बाजारों में बिक्री के अवसर उपलब्ध कराने की जरूरत है।
अब सवाल यह है कि दीपावली पर दूसरों के घरों को रोशन करने वाले इन कुम्हार परिवारों के घरों में खुशियों का दीया कब जलेगा? यदि लोग ‘वोकल फॉर लोकल’ की भावना के साथ स्थानीय कारीगरों से मिट्टी के दीये खरीदते हैं, तो इससे न केवल भारतीय परंपरा को मजबूती मिलेगी, बल्कि उन परिवारों की आर्थिक स्थिति को भी सहारा मिल सकता है, जिनकी कई पीढ़ियां इसी हुनर के सहारे जीवन गुजारती आई हैं।
