विशेष रिपोर्ट
लोकतंत्र में पत्रकारिता को चौथा स्तंभ माना जाता है, लेकिन मौजूदा समय में पत्रकारों की सुरक्षा और स्वतंत्रता को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों से मीडिया कर्मियों के साथ कथित दुर्व्यवहार, पुलिस कार्रवाई, धमकी, मारपीट और कानूनी कार्रवाई की खबरें सामने आती रही हैं। इन घटनाओं ने पत्रकारों की सुरक्षा के साथ-साथ प्रशासनिक व्यवस्था और कानून के राज को लेकर भी गंभीर बहस खड़ी कर दी है।
कई मामलों में पत्रकारों ने आरोप लगाया है कि रिपोर्टिंग के दौरान उन्हें दबाव में लेने का प्रयास किया गया। कहीं पुलिस थाने में कथित मारपीट का मामला सामने आया, तो कहीं पत्रकारों पर मुकदमे दर्ज किए जाने या जिला बदर जैसी कार्रवाई का सामना करना पड़ा। इसके अलावा प्रभावशाली लोगों और रसूखदार व्यक्तियों पर भी पत्रकारों को डराने-धमकाने अथवा उनके काम में बाधा डालने के आरोप लगते रहे हैं।
तीखे सवालों पर पत्रकारों को धमकी देने के आरोप
पत्रकारिता का मूल दायित्व सत्ता और व्यवस्था से सवाल पूछना तथा जनता से जुड़े मुद्दों को सामने लाना है। हाल में एक ऐसा मामला भी चर्चा में आया, जिसमें जनता के हित से जुड़े सवाल पूछने वाले पत्रकार को कथित तौर पर मंत्री की ओर से सार्वजनिक रूप से धमकी दी गई। पत्रकार के अनुसार, उन्हें कुछ ही समय में ‘ठीक कर देने’ की बात कही गई।
इस तरह की कथित धमकियां पत्रकारों की स्वतंत्रता और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती हैं। सवाल यह है कि यदि पत्रकार सत्ता और प्रशासन से कठिन सवाल नहीं पूछ पाएंगे, तो आम जनता की समस्याओं और व्यवस्था की कमियों को सामने कौन लाएगा?
बाइक और उपकरणों की जब्ती पर भी सवाल
पत्रकारों के उत्पीड़न से जुड़े मामलों में एक अन्य गंभीर मुद्दा उनके वाहनों और पत्रकारिता से जुड़े उपकरणों की जब्ती का भी है। आरोप लगाए गए हैं कि कुछ मामलों में पत्रकारों की बाइक, कैमरा और अन्य सामान जब्त किए गए, लेकिन उन्हें कथित तौर पर जब्ती से संबंधित आधिकारिक दस्तावेज या सीजर मेमो उपलब्ध नहीं कराया गया।
सामान की कानूनी जब्ती की प्रक्रिया में संबंधित दस्तावेज और रिकॉर्ड बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। ऐसे में यदि किसी पत्रकार का वाहन या उपकरण जब्त किया जाता है और उसे प्रक्रिया से संबंधित दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराया जाता, तो कार्रवाई की पारदर्शिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। पत्रकार संगठनों का आरोप है कि ऐसी कार्रवाई का इस्तेमाल मीडिया कर्मियों पर मानसिक और आर्थिक दबाव बनाने के लिए किया जा सकता है।
पत्रकार सुरक्षा कानून की मांग क्यों तेज हो रही है?
पत्रकार संगठनों और मीडिया से जुड़े लोगों का कहना है कि पत्रकारों की सुरक्षा के लिए मौजूदा कानूनी व्यवस्था पर्याप्त नहीं है। उनका तर्क है कि पत्रकारों को पुलिस, प्रशासनिक दबाव और राजनीतिक प्रभाव से बचाने के लिए विशेष सुरक्षा व्यवस्था की जरूरत है।
इसी मांग के तहत लंबे समय से देश में केंद्रीय स्तर पर ‘जर्नलिस्ट प्रोटेक्शन एक्ट’ या पत्रकार सुरक्षा कानून बनाने की मांग उठती रही है। मांग करने वाले संगठनों का कहना है कि पत्रकारों पर हमला करने के मामलों में कड़ी कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए और दोषी पाए जाने वाले लोगों के खिलाफ प्रभावी एवं त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए।
साथ ही यह मांग भी उठ रही है कि यदि किसी अधिकारी द्वारा नियमों के विपरीत पत्रकार का वाहन या उपकरण जब्त किया जाता है, तो मामले की जांच कर जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ समयबद्ध विभागीय कार्रवाई की जाए।
पत्रकारों की सुरक्षा लोकतंत्र से जुड़ा सवाल
पत्रकारों के खिलाफ कथित दबाव, धमकी या कार्रवाई को केवल किसी एक व्यक्ति अथवा मीडिया संस्थान का मामला मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता और शासन के बीच महत्वपूर्ण कड़ी का काम करती है।
यदि पत्रकारों को अपने काम के दौरान डर, दबाव या प्रतिशोध की आशंका बनी रहेगी, तो इसका सीधा असर स्वतंत्र रिपोर्टिंग पर पड़ सकता है। ऐसे में जरूरी है कि पत्रकारों की सुरक्षा से जुड़े मामलों की निष्पक्ष जांच हो, कानून का पालन सुनिश्चित किया जाए और दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।
लोकतंत्र में सवाल पूछने और व्यवस्था की कमियों को सामने लाने की पत्रकारों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। इसलिए ऐसी व्यवस्था की जरूरत है, जिसमें पत्रकार बिना भय और दबाव के अपना पेशेवर एवं लोकतांत्रिक दायित्व निभा सकें।
