नेपाल स्थित जनकपुरधाम को मिथिला नरेश राजा जनक की राजधानी माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यहीं स्थित जानकी महल वह स्थान है, जहां माता सीता का जन्म, पालन-पोषण और शिक्षा-दीक्षा हुई। यह स्थल आज भी करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है।
बचपन में ही माता सीता ने दिखाई थी अद्भुत शक्ति
धार्मिक कथाओं के अनुसार, बाल्यकाल में माता सीता ने भगवान शिव के विशाल धनुष को अपनी कनिष्ठ अंगुली से उठाकर उसके नीचे की सफाई कर पुनः उसी स्थान पर रख दिया था। इस दृश्य को देखकर राजा जनक आश्चर्यचकित रह गए और उन्होंने अपनी पुत्री को दिव्य शक्ति का स्वरूप माना। इसके बाद उन्होंने संकल्प लिया कि जो वीर शिव धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाएगा, उसी के साथ सीता का विवाह होगा।
शिव धनुष भंग के बाद भेजा गया विवाह का निमंत्रण
समय आने पर जनकपुर में स्वयंवर और धनुष यज्ञ का आयोजन हुआ। महर्षि विश्वामित्र के साथ पहुंचे भगवान श्रीराम ने शिव धनुष को उठाकर भंग कर दिया। इसके बाद राजा जनक ने अयोध्या के महाराज दशरथ को सीता-राम विवाह के लिए आमंत्रित किया।
भव्य बारात के स्वागत से सजी पूरी मिथिला
भगवान राम की बारात जब अयोध्या से जनकपुर पहुंची तो पूरे मिथिला क्षेत्र को भव्य रूप से सजाया गया। नगर में स्वागत द्वार, रंगोलियां, मंगल कलश, पताकाएं और पारंपरिक सजावट की गई। हाथी, घोड़े, रथ, शहनाई, ढोल-नगाड़े और अन्य वाद्ययंत्रों के बीच बारात का स्वागत किया गया। पूरे नगर में उत्सव जैसा वातावरण था और हर घर में मंगलगीत गूंज रहे थे।
देवताओं और ऋषि-मुनियों की उपस्थिति का उल्लेख
धार्मिक परंपराओं के अनुसार, इस दिव्य विवाह के साक्षी बनने के लिए अनेक ऋषि-मुनि, तपस्वी और देवता भी उपस्थित हुए। गुरु वशिष्ठ, गुरु विश्वामित्र और गुरु शतानंद सहित अनेक महापुरुषों ने विवाह समारोह में भाग लिया। राजा जनक ने सभी अतिथियों का सम्मानपूर्वक स्वागत किया और वैदिक विधि-विधान से विवाह की तैयारियां संपन्न कराईं।
चार भाइयों और चार बहनों का हुआ विवाह
विवाह मंडप में भगवान राम और माता सीता के साथ-साथ लक्ष्मण-उर्मिला, भरत-मांडवी तथा शत्रुघ्न-श्रुतकीर्ति का विवाह भी वैदिक परंपराओं के अनुसार संपन्न हुआ। राजा जनक और माता सुनयना ने कन्यादान किया। इसके बाद वरमाला, हवन, सप्तपदी, सिंदूरदान सहित सभी वैवाहिक संस्कार पूरे किए गए।
मिथिला की संस्कृति और परंपराओं का दिखा अनूठा स्वरूप
विवाह के दौरान मिथिला की सांस्कृतिक विरासत पूरी भव्यता के साथ दिखाई दी। पारंपरिक गीत, मंगलगान, विवाह रस्में, लोक परंपराएं और अतिथि सत्कार इस आयोजन का विशेष आकर्षण बने। विवाह के बाद कोहबर की रस्म में मिथिलानी सखियों और भगवान राम के बीच हास्य-परिहास का भी वर्णन धार्मिक कथाओं में मिलता है।
आज भी धूमधाम से मनाई जाती है विवाह पंचमी
जनकपुरधाम स्थित जानकी महल में आज भी विवाह पंचमी का उत्सव अत्यंत श्रद्धा और भव्यता के साथ मनाया जाता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार, समय-समय पर अयोध्या से प्रतीकात्मक बारात जनकपुर पहुंचती है, जहां स्थानीय प्रशासन, मंदिर प्रबंधन और श्रद्धालु पारंपरिक रीति-रिवाजों से उसका स्वागत करते हैं।
छप्पन भोग और अतिथि सत्कार की परंपरा
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, विवाह के बाद बारातियों के लिए भव्य जेवनार का आयोजन किया गया था। इसमें विभिन्न प्रकार के व्यंजन, मिठाइयां, दही, घी, लस्सी, छाछ, अचार, चटनी और पारंपरिक भोजन परोसा गया। मिथिला की अतिथि सत्कार की परंपरा और सांस्कृतिक समृद्धि इस आयोजन की प्रमुख विशेषताओं में शामिल मानी जाती है।
धार्मिक मान्यताओं में सीता-राम विवाह को आदर्श वैवाहिक संस्कार का प्रतीक माना जाता है। यह केवल दो व्यक्तियों का विवाह नहीं, बल्कि अयोध्या और मिथिला के सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और पारिवारिक संबंधों का भी प्रतीक माना जाता है। आज भी विवाह पंचमी के अवसर पर जनकपुरधाम में हजारों श्रद्धालु इस दिव्य परंपरा के साक्षी बनने पहुंचते हैं।
