नई दिल्ली। बदलते सामाजिक परिवेश में माता-पिता और विवाहित बेटियों के रिश्तों के बीच संतुलन बनाए रखने की सीख देती लघुकथा ‘ना छेड़ो गृहस्थी बेटी की’ इन दिनों चर्चा का विषय बनी हुई है। लेखिका वीना सक्सेना ने इस कथा के माध्यम से यह संदेश देने का प्रयास किया है कि विवाह के बाद बेटी के नए परिवार पर भरोसा करना और उसकी गृहस्थी में अनावश्यक हस्तक्षेप से बचना रिश्तों को मजबूत बनाए रखने के लिए आवश्यक है।
कहानी की शुरुआत सरला जी से होती है, जो अपनी बेटी श्रुति की शादी के छह महीने बाद भी प्रतिदिन उसका हालचाल जानने के लिए फोन करती हैं। बेटी के नए घर-परिवार की हर छोटी-बड़ी बात जानने की उनकी उत्सुकता धीरे-धीरे उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन जाती है।
एक दिन जब सरला जी सुबह फोन करती हैं तो श्रुति व्यस्त होने के कारण बाद में बात करने की बात कहती है। इससे माँ चिंतित हो जाती हैं और बेटी के ससुराल की स्थिति को लेकर तरह-तरह के विचार उनके मन में आने लगते हैं।
करीब दो घंटे बाद श्रुति स्वयं फोन कर माँ से बात करती है। बातचीत के दौरान वह बताती है कि सुबह घर के सभी सदस्य कार्यालय जाते हैं, इसलिए उस समय घरेलू कार्य अधिक रहते हैं। इस पर सरला जी यह जानना चाहती हैं कि क्या घर का पूरा काम वही करती है।
श्रुति शांत भाव से अपनी माँ को समझाती है कि उसके ससुराल में सभी सदस्य मिल-जुलकर काम करते हैं और उसे किसी प्रकार की परेशानी नहीं है। वह माँ से अनुरोध करती है कि यदि संभव हो तो दोपहर के बाद फोन किया करें, ताकि वह आराम से बातचीत कर सके।
बेटी की संतुलित और परिपक्व बातों को सुनकर सरला जी को यह एहसास होता है कि उनकी बेटी अब अपने नए परिवार में पूरी तरह रच-बस चुकी है। उन्हें महसूस होता है कि हर समय सलाह देने के बजाय बेटी पर विश्वास करना और उसे अपने जीवन के निर्णय स्वयं लेने देना अधिक आवश्यक है।
कथा के अंत में लेखिका यह संदेश देती हैं कि विवाह के बाद बेटी के प्रति माता-पिता का स्नेह और अपनापन बना रहना चाहिए, लेकिन उसकी गृहस्थी में अनावश्यक हस्तक्षेप, संदेह या लगातार निर्देश देने से बचना चाहिए। विश्वास, समझ और संतुलित संवाद ही मायके और ससुराल दोनों के रिश्तों को मजबूत बनाए रखने की सबसे बड़ी आधारशिला हैं।
