परंपरागत खेती में मेहनत अधिक और आमदनी सीमित होने से किसान अब फल और सब्जियों की खेती की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। आधुनिक तरीके से की जाने वाली खेती कम समय में उत्पादन देने के साथ किसानों को बाजार से जोड़ने का अवसर भी दे रही है।
कन्हैया साहनी ने पपीते की खेती के लिए मध्य प्रदेश से पौधे मंगाया है। उनके अनुसार बीज ताइवान से आता है और नीमक प्रजाति का है। खेत में पौधों की देखभाल और फसल प्रबंधन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। पारंपरिक फसलों के साथ पपीते की खेती शुरू करने का उद्देश्य खेती से बेहतर आमदनी हासिल करना है।
पपीता खरीदने के लिए व्यापारियों की लगती है भीड़
पपीता ऐसी फल फसल है, जिसमें वैज्ञानिक तरीके से खेती करने पर अपेक्षाकृत कम अवधि में उत्पादन शुरू हो सकता है। सामान्य परिस्थितियों में रोपण के करीब आठ से दस माह बाद पपीते में फल आना शुरू हो सकता है। इसकी खेती के लिए खेत में जलनिकासी की अच्छी व्यवस्था जरूरी है, क्योंकि पानी जमा होने से पौधों को नुकसान पहुंच सकता है।
कन्हैया की दो एकड़ में लगी पपीते की फसल अब आसपास के किसानों का भी ध्यान खींच रही है। दूसरे किसान उनके खेत पर पहुंचकर खेती के तरीके और फसल प्रबंधन की जानकारी ले रहे हैं। कन्हैया का कहना है कि खेती में बदलाव कर किसान अपनी आय के नए रास्ते तलाश सकते हैं।
पपीते की खेती से होने वाली आमदनी से परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारने के साथ बच्चों की बेहतर शिक्षा में भी मदद मिल रही है। जबकि खेत में सुबह से पपीता खरीदने के लिए व्यापारियों की भीड़ लग जाती है। व्यापारी द्वारा पपीते को कोल्हुई, बहदुरी, बृजमनगंज, फरेन्दा, महराजगंज व गोरखपुर बाजारों में बेचा जा रहा है।
