भारतीय व्यंजनों की बात हो और कर्नाटक के ग्रामीण स्वाद का जिक्र न आए, ऐसा हो ही नहीं सकता। दक्षिण कर्नाटक- खासकर मैसूर, तुमकुरु, मांड्या और इसके आस-पास के इलाकों में एक डिश बहुत ही चाव से खाई जाती है, जिसका नाम है ‘रागी मुद्दे’।
आम आदमी की रसोई से सुपरफूड बनने का सफर
रागी असल में एक पौष्टिक मोटा अनाज है। दक्षिण भारत के खेतों में इसकी पैदावार कोई नई बात नहीं है, बल्कि यहां सदियों से इसे उगाया जा रहा है। पुराने समय की बात करें तो रागी का आटा हर जगह बड़ी आसानी से मिल जाया करता था, इसलिए आम लोगों ने इसे अपनी रोजमर्रा की रसोई का हिस्सा बना लिया। समय के साथ यह वहां की ग्रामीण संस्कृति और पारंपरिक भोजन की सबसे बड़ी पहचान बन गया।
अगर आपके मन में यह सवाल है कि इसे ‘मुद्दे’ क्यों कहा जाता है, तो इसका जवाब स्थानीय भाषा में छिपा है। दरअसल, कन्नड़ भाषा में ‘मुद्दे’ शब्द का मतलब होता है- एक नरम, गोल आकार की लोई या गोला। इसी गोल आकार की वजह से इस डिश को यह खास नाम मिला है।
स्वाद ही नहीं, हड्डियों के लिए कैल्शियम का भी खजाना
रागी मुद्दे सिर्फ भूख नहीं मिटाता, बल्कि यह शरीर के लिए कैल्शियम का एक बहुत ही बेहतरीन और प्राकृतिक वनस्पति स्रोत भी है। इस व्यंजन का असली मजा तभी है, जब इसे चूल्हे से उतारकर बिल्कुल गरमा-गरम परोसा जाए।
इसे खाने का पारंपरिक तरीका भी बेहद खास है। लोग इसे अक्सर ‘बस्सारु’ नाम की एक पारंपरिक करी के साथ खाते हैं। यह करी बनाने का तरीका बड़ा ही अनोखा है- इसे दाल या सब्जियों को उबालने के बाद बचे हुए पानी में खास मसाले मिलाकर तैयार किया जाता है। इसके अलावा, रागी मुद्दे के स्वाद को दोगुना करने के लिए इसे ‘सारु’, ‘उप्सारु’ या फिर दाल और ढेर सारी सब्जियों से बने स्वादिष्ट सांभर के साथ भी परोसा जाता है।
