धार्मिक नगरी वाराणसी स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर प्रांगण में मौजूद प्राचीन पीपल वृक्ष के संरक्षण के लिए विशेष अभियान की शुरुआत की गई है। वर्षों पुराने इस पवित्र वृक्ष के सूखने की आशंका को देखते हुए अब इसके दीर्घकालिक संरक्षण के लिए वैज्ञानिक और पारंपरिक तरीकों का संयुक्त रूप से उपयोग किया जा रहा है।

इस पहल का उद्देश्य इस ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व वाले वृक्ष को आगामी 100 से 200 वर्षों तक सुरक्षित और जीवित बनाए रखना है।

वैज्ञानिक और पारंपरिक विधियों का समन्वय

संरक्षण प्रक्रिया के तहत विशेषज्ञों की देखरेख में वृक्ष का उपचार शुरू किया गया है। इसमें जैविक पद्धति अपनाते हुए औषधियों और नीम के तेल का मिश्रण तैयार कर वृक्ष पर छिड़काव किया गया। इस प्रक्रिया में पर्यावरण और धार्मिक मान्यताओं दोनों का विशेष ध्यान रखा गया है।

गंगाजल और त्रिवेणी जल का उपयोग

उपचार के दौरान करीब 1200 लीटर गंगाजल और त्रिवेणी का पवित्र जल इस्तेमाल किया गया। इससे न केवल वैज्ञानिक उपचार सुनिश्चित किया गया, बल्कि धार्मिक आस्था और शुद्धता का भी पूरा ख्याल रखा गया।

विशेषज्ञों की मौजूदगी

इस अवसर पर प्रोफेसर एस.पी. सिंह, डॉ. प्रशांत, डॉ. कल्याण बर्मन, ओम प्रकाश और तेजनाथ वर्मा सहित कई विशेषज्ञ उपस्थित रहे। सभी ने भगवान बाबा विश्वनाथ से इस प्राचीन वृक्ष की रक्षा और दीर्घायु की कामना की।

सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व

यह पीपल वृक्ष न केवल प्राकृतिक धरोहर है, बल्कि धार्मिक आस्था का भी प्रतीक माना जाता है। काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर में इसकी मौजूदगी इसे और अधिक महत्वपूर्ण बनाती है। श्रद्धालु इसे पवित्र मानकर पूजा-अर्चना भी करते हैं।

दीर्घकालिक संरक्षण की पहल

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की पहल से न केवल वृक्ष की उम्र बढ़ाई जा सकती है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए इसे सुरक्षित भी रखा जा सकता है। वैज्ञानिक तकनीकों और पारंपरिक मान्यताओं का यह संगम संरक्षण के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उदाहरण साबित हो सकता है।

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