UGC पर मोदी जी, उनका पूरा कैबिनेट, कार्यालय, सूचना-प्रौद्योगिकी सेल लगभग चुप रहा। चौदह दिन तक चूँ-चाँ नहीं। टीवी पर प्रवक्ता नहीं भेजे, कोई खंडन वाला मुख्यालयी प्रेस वार्ता नहीं। केवल चुप्पी।

आज एप्सटीन फाइल में नाम आया, कॉन्ग्रेस ने दो कौड़ी की बात का बतंगड़ किया, सीधे विदेश मंत्रालय द्वारा स्टेटमेंट लिखित में जेपेग फाइल के साथ आया। ट्विटर पर शेयर हुआ, हर प्रवक्ता बता रहा है कि कॉन्ग्रेस ***पा कर रही है।

सामान्य वर्ग के नागरिकों का एक बड़ा हिस्सा कुढ़ रहा था, गरिया रहा था, उत्तर माँग रहा था… मोदी ने एक बार भी पूरे तंत्र के किसी भी हिस्से से कोई सहानुभूति नहीं दिखाई। केवल चुप्पी कि तुम साले थक कर बैठ जाओगे, तुम्हारी यही औकात है।

नरेन्द्र मोदी आपदा प्रबंधन दल यह जानता है कि नीतिगत विषयों से अधिक महत्वपूर्ण व्यक्तिगत छवि है क्योंकि उसे बचाएँगे तब ही आगे की नीति बन पाएगी। तब ही बिहार की रैली में कुर्मी, कानू, मल्लाह, दुसाध, डोम, मुसहर, रविदास, बढ़ई, माली का नाम ले कर उसके परिजन होने की बात हो पाएगी।

सामान्य वर्ग, इनके स्कीम ऑफ थिंग्स में केवल टैक्सदाता है। टैक्सपेयर जब ‘टैक्सदाता’ हो जाता है तो उसमें एक देवत्व का भाव आ जाता है। मोदी जी ने ‘दाता’ लगा कर बहुत काटा है, यह हर दूसरे दिन स्पष्ट हो रहा है।

संभवतः, यह नीति देश के लिए बढ़िया हो, समाज के हर वर्ग (मायनस जेनरल) का सरकारी उत्थान हो रहा हो, मोदी क्लास अपार्ट और लेजेंडरी नेता हों, पर ‘दाता’ का धैर्य किसी दिन तो टूटेगा!

सामान्य वर्ग के दो तिहाई बच्चे शिक्षा लोन ले कर पढ़ाई कर रहे हैं, ये @narendramodi को नहीं दिखा। फीस में कोई छूट नहीं, बढ़ता ब्याज और सरकारी उपेक्षा में पिसता सामान्य वर्ग का बैल, देश की गाड़ी ढो रहा है। उसकी कमाई का दशांश भी यदि उसके भाई को मिल रहा है तो उसे मोदी की किसी निजी संपत्ति का हिस्सा मान कर ढोल पीटा जा रहा है।

अन्य वर्ग (अल्पसंख्यक सहित) के लोग शिक्षा लोन ले कर डिफॉल्ट कर दें, न चुकाएँ, कुछ विशेष नहीं होता, सामान्य वर्ग की कुर्की-जब्ती होती है। आगे वह कभी लोन लेने लायक नहीं रहता।

हर उद्यमी योजना, हॉस्टल, निःशुल्क कोचिंग, विशेष स्कूल-कॉलेज SC/ST/OBC/अल्पसंख्यक के लिए क्यों? आरक्षण का तो समझ में आता है कि जब अवधारणा आई तो आर्थिक और जातिगत पिछड़ापन समानांतर ही था, पर अब इसे अन्य योजनाओं में जातिगत क्यों बनाया जा रहा है?

ये योजनाएँ तो संवैधानिक नहीं हैं, न कोई ऐसी बाध्यता है, फिर मोदी जी, जो विजनरी नेता हैं, उनकी सोच चुनावी संकुचन में डूबी क्यों है? यहाँ आप कोचिंग में आर्थिक मापदंड क्यों नहीं लगा पा रहे? क्योंकि जो बात ‘हिसाब चुकता’ करवाने वाले भाषण की प्रतिक्रिया से मिलने वाली किक में है, वो अन्यत्र नहीं।

नरेन्द्र मोदी की यह चुप्पी समाज को तोड़ने वाली है, हिन्दुओं को इस्लामी/वामपंथी फॉर्मूले से बाँटने वाली है। यह व्यक्ति आज भी चुप है, इसके पास सहानुभूति के शब्द नहीं हैं, इनके प्रवक्ता अभी भी सुप्रीम कोर्ट का नाम ले कर ‘जय मोदी, तय मोदी’ कह कर नाच रहे हैं।

ऐसी ‘छवि प्रबंधन’ का क्या लाभ जब समाज आपकी नीतियों से टूटने लगे
शैलेन्द्र मिश्र
अध्यक्ष
ब्राह्मण परिषद उत्तर प्रदेश

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