बिहार में एक और जो बड़ी समस्या है वो बैंकों द्वारा लोन नहीं मिलने की है। जबकि डेटा कहता है की बिहार लोग बैंकों को ज्यादा पैसे जमा करते हैं जिस मुकाबले में उन्हें ऋण मिलता है और ऋण लौटाने में भी राष्ट्रीय औसत से कहीं बेहतर हैं।
ये जो तरक्की दिखाते हो ये हमारे पैसों की बनी हुई तरक्की है। हमें हमारा हिस्सा लौटा दो। प्रधानमंत्री जी ने पिछले बजट के बाद में किसी एक राष्ट्रीय बैंक का हेडक्वार्टर पटना में बनाने की बात की थी, अभी तक तो कोई सुगबुगाहट नहीं दिखती है। न ही कोई विशेष कार्य होता दिख रहा जहां ऋण सुविधा आसानी से मिले।
अगर कोई गुजरात महाराष्ट्र का डेटा दिखाता है तो उसका कारण है की उधर स्वयं सहायता समूह जैसे संगठन काफी प्रभाविक हैं और लोगों को बैंकों से लोन उठाने की उतनी जरूरत नहीं पड़ती। दिल्ली आदि में भी कमिटी और बीसी जैसी चीजों के वजह से लोन लेने के लिए बैंक के चक्कर नहीं लगाने पड़ते मगर बिहार में ये दोनों भी नहीं है और बैंकों का रवैया बेहद खराब होने की वजह से यहां कोई नया उद्यम स्थापित करने में लाख समस्याएं आती हैं।
दो न्याय अगर तो आधा दो।
