लालू जी और नीतीश जी के बीच बेहतर सम्बन्ध कैसे बने?

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1980 और 1990 के दशक का बिहार भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण दौर था। यह वह समय था जब सामाजिक और राजनीतिक बदलाव की लहर पूरे देश में चल रही थी। लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार, दोनों ही इस बदलाव के केंद्र में थे। दोनों नेताओं के बीच के संबंध, उनकी मित्रता और फिर राजनीतिक मतभेदों की कहानी भारतीय राजनीति के इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है।


शुरुआती दिन: लालू-नीतीश की दोस्ती की शुरुआत

1989 के दशक में नीतीश कुमार एक उभरते हुए नेता थे। उनकी छवि एक ईमानदार और बौद्धिक नेता की थी। हिंदी भाषा पर उनकी अच्छी पकड़ और विचारों की स्पष्टता उन्हें अन्य नेताओं से अलग बनाती थी। इस समय लालू प्रसाद यादव विपक्ष के नेता थे और नीतीश उनके लिए प्रेस नोट लिखने का काम करते थे। यह वह समय था जब दोनों नेताओं के बीच नजदीकियां बढ़ीं।

1990 में जब लालू प्रसाद यादव बिहार के मुख्यमंत्री बने, तो नीतीश कुमार उनके मुख्य सलाहकार बन गए। लालू के नेतृत्व में जनता दल ने 1991 के लोकसभा चुनाव में शानदार प्रदर्शन किया। अविभाजित बिहार में 54 में से 48 सीटें जनता दल ने जीतीं। इस समय लालू का राजनीतिक प्रभाव अपने चरम पर था।


सत्ता और मतभेद: दोस्ती में आई दरार

हालांकि, लालू और नीतीश के रिश्तों में पहली दरार 1993 के अंत में आई। जनता दल में वरिष्ठ नेताओं जैसे जॉर्ज फर्नांडिस, शरद यादव और रामविलास पासवान को यह महसूस हुआ कि पार्टी में उनका प्रभाव कम हो रहा है। यह समय मंडल और कमंडल की राजनीति का था। लालू मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू कर सामाजिक न्याय की राजनीति को बढ़ावा दे रहे थे, जबकि नीतीश ने कमंडल की राजनीति को अपनाते हुए एक अलग राह चुनी।

1994 में नीतीश कुमार ने जॉर्ज फर्नांडिस के साथ मिलकर समता पार्टी का गठन किया। यह कदम बिहार की राजनीति में एक बड़ा मोड़ साबित हुआ। लालू के खिलाफ विद्रोह करने वाले नीतीश पहले नेता बने, जिन्होंने खुले तौर पर उनकी नीतियों का विरोध किया।


मंडल बनाम कमंडल: सामाजिक न्याय और ध्रुवीकरण की राजनीति

1990 का दशक मंडल आयोग की सिफारिशों के कारण सामाजिक न्याय की राजनीति का दौर था। लालू यादव ने पिछड़े वर्गों को सशक्त करने के लिए मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू किया। वहीं, नीतीश कुमार ने भाजपा के साथ गठबंधन कर कमंडल की राजनीति को अपनाया। यह दौर बिहार में सामाजिक और राजनीतिक ध्रुवीकरण का था।


फिर से साथ: लालू-नीतीश का नया अध्याय

साल 2015 में बिहार की राजनीति ने एक और करवट ली। नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव ने पुराने मतभेद भुलाकर फिर से हाथ मिलाया। महागठबंधन के रूप में दोनों नेताओं ने भाजपा के खिलाफ एकजुट होकर चुनाव लड़ा। इस गठबंधन ने बिहार विधानसभा चुनाव में बड़ी जीत दर्ज की।


निष्कर्ष: राजनीति में संबंधों का महत्व

लालू यादव और नीतीश कुमार की कहानी यह दिखाती है कि राजनीति में दोस्ती और मतभेद दोनों संभव हैं। दोनों नेताओं ने अपने-अपने समय में बिहार की राजनीति को नई दिशा दी। उनके संबंधों का उतार-चढ़ाव न केवल बिहार बल्कि पूरे देश की राजनीति को प्रभावित करता रहा है।

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