विवाह के बाद बेटी का मायके से रिश्ता भले ही भावनात्मक रूप से पहले जैसा बना रहे, लेकिन समय और परिस्थितियां अक्सर उसकी भूमिका बदल देती हैं। इसी संवेदनशील पहलू को लेखिका अभिलाषा श्रीवास्तव ने अपनी लघुकथा ‘मेहमान हूँ’ में बेहद मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है।
कहानी की नायिका दिव्या पति से नाराज होकर इस उम्मीद में मायके आती है कि परिवार का स्नेह और अपनापन उसे संबल देगा। लेकिन मायके पहुंचने के बाद उसे महसूस होता है कि समय के साथ रिश्तों की प्राथमिकताएं बदल चुकी हैं। भाई अपनी आर्थिक जिम्मेदारियों में उलझा है, भाभी घरेलू कामकाज के दबाव में हैं और माता-पिता उम्र के इस पड़ाव पर घर की शांति बनाए रखने के लिए चुप्पी साधे हुए हैं।
इन परिस्थितियों के बीच दिव्या को पहली बार यह एहसास होता है कि जिस घर को वह हमेशा अपना समझती थी, वहां अब उसकी भूमिका एक मेहमान जैसी हो गई है। उसका पुराना कमरा भी अब स्टोर रूम में बदल चुका है, जो समय के बदलाव का एक प्रतीक बनकर सामने आता है।
गेस्ट रूम में लगी अपनी बुआ की तस्वीर देखकर दिव्या अतीत में खो जाती है। उसे याद आता है कि दादा-दादी के निधन के बाद पारिवारिक मतभेदों ने उनकी बुआ का मायके से रिश्ता भी लगभग खत्म कर दिया था। यही दृश्य दिव्या को अपने वर्तमान और भविष्य पर सोचने के लिए मजबूर कर देता है।
भावुक होकर वह अपने पति अक्षय को फोन करती है। बातचीत के दौरान उसे यह गहरा एहसास होता है कि विवाह के बाद स्त्री के जीवन में मायके और ससुराल के रिश्तों का संतुलन कितना नाजुक होता है।
कहानी का सबसे प्रभावशाली संदेश अंत में सामने आता है, जब दिव्या स्वयं को संभालते हुए अपने बिखरे सामान के साथ अपने मन को भी समेटने का प्रयास करती है। यह लघुकथा रिश्तों की वास्तविकताओं, समय के बदलाव और आत्मबल के महत्व को संवेदनशील तरीके से प्रस्तुत करती है।
लेखिका: अभिलाषा श्रीवास्तव, गोरखपुर