ग्रामीण क्षेत्रों मे स्वास्थ्य सुविधाओं की बदहाली और आपातकालीन सेवाओं की उपलब्धता पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं।

धोलाबेड़ा पंचायत के फुलझरी गांव से इलाज के लिए सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र डुमरिया ले जाए जा रहे 45 वर्षीय कारु मार्डी की रास्ते में मौत हो गई।

परिजनों का आरोप है कि शनिवार की सुबह अचानक तबीयत बिगड़ने पर एम्बुलेंस के लिए संपर्क किया गया, लेकिन समय पर एम्बुलेंस उपलब्ध नहीं हो सकी।

मजबूर होकर परिजनों को मरीज को टेंपो से अस्पताल ले जाना पड़ा। विडंबना यह रही कि मौत के बाद शव को घर पहुंचाने के लिए भी परिवार को किसी जनप्रतिनिधि से मदद नहीं मिली।

अंततः रिश्तेदारों से 3500 रुपये उधार लेकर मालवाहक टेंपो से शव गांव ले जाना पड़ा। परिजनों के अनुसार, मृतक कारु मार्डी मूल रूप से धालभूमगढ़ प्रखंड के जोड़सा गांव का रहने वाला था।

वह पिछले मंगलवार को अपनी पत्नी, दस वर्षीय बेटे और ढाई वर्षीय बेटी के साथ ससुराल फुलझरी आया था। शुक्रवार को बुखार की शिकायत होने पर परिजनों ने एक ग्रामीण चिकित्सक से उसका इलाज कराया। लेकिन शनिवार की सुबह करीब पांच बजे अचानक उसकी तबीयत ज्यादा बिगड़ गई।

परिवार के लोग घबराकर उसे अस्पताल पहुंचाने की कोशिश में जुट गए। परिजनों का कहना है कि एम्बुलेंस के लिए संपर्क करने पर उपलब्ध नहीं होने की बात बताई गई।

काफी देर तक प्रयास करने के बाद मरीज को एक टेंपो पर लादकर सुबह करीब दस बजे सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र डुमरिया लाया। परंतु तबतक काफी देर हो चुका था।

वहां मौजूद चिकित्सक डॉ. सुषमा हांसदा ने जांच के बाद उसे मृत घोषित कर दिया। कारु मार्डी की मौत से पत्नी और दो छोटे बच्चों पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा।

परिवार के सामने अब पति को खोने का गम था, तो दूसरी ओर शव को अपने पैतृक गांव जोड़सा ले जाने की समस्या खड़ी हो गई। मृतक की पत्नी ने शव को धालभूमगढ़ प्रखंड स्थित अपने गांव तक पहुंचाने के लिए जनप्रतिनिधियों से सहसहयोग की गुहार लगाई। लेकिन परिजनों के मुताबिक, कहीं से भी मदद नहीं मिली।

आखिरकार, बेबस पत्नी को अपने रिश्तेदारों से 3500 रुपये उधार मांगने पड़े। इसके बाद एक मालवाहक टेंपो की व्यवस्था कर पति के शव को गांव ले जाया गया। जिस परिवार को इस कठिन समय में सरकारी व्यवस्था और जनप्रतिनिधियों के सहारे की जरूरत थी, उसे आर्थिक तंगी के बीच शव ढोने का इंतजाम खुद करना पड़ा।
आखिरकार, बेबस पत्नी को अपने रिश्तेदारों से 3500 रुपये उधार मांगने पड़े। इसके बाद एक मालवाहक टेंपो की व्यवस्था कर पति के शव को गांव ले जाया गया। जिस परिवार को इस कठिन समय में सरकारी व्यवस्था और जनप्रतिनिधियों के सहारे की जरूरत थी, उसे आर्थिक तंगी के बीच शव ढोने का इंतजाम खुद करना पड़ा।

यह घटना ग्रामीण इलाकों में आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता और जरूरतमंद परिवारों को मिलने वाली सहायता पर सवाल खड़े करती है।

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