2 सितंबर 1933 का दिन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में क्रांतिकारी बलिदान की एक महत्वपूर्ण घटना के रूप में याद किया जाता है। बंगाल के मिदनापुर में अंग्रेजी शासन के खिलाफ क्रांतिकारी गतिविधियां अपने चरम पर थीं। इसी दौर में दो युवा क्रांतिकारी मित्र अनाथ बंधु पांजा और मृगेन्द्र कुमार दत्त ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ साहसिक कार्रवाई करते हुए अपने प्राण न्योछावर कर दिए।

उस समय मिदनापुर जिले में क्रांतिकारी गतिविधियों से अंग्रेजी प्रशासन परेशान था। इन गतिविधियों पर अंकुश लगाने के लिए अंग्रेज सरकार ने जेम्स पेड्डी को जिले का जिलाधिकारी नियुक्त किया। पेड्डी अपने कठोर और दमनकारी रवैये के लिए कुख्यात था। छोटी-छोटी बातों पर लोगों को कड़ी सजा दिए जाने से स्थानीय लोगों और क्रांतिकारियों में उसके खिलाफ आक्रोश बढ़ता गया।

क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी प्रशासन को चेतावनी दी कि मिदनापुर में किसी भारतीय अधिकारी की नियुक्ति की जाए, लेकिन उनकी मांग पर ध्यान नहीं दिया गया। इसके बाद जेम्स पेड्डी की हत्या कर दी गई।

पेड्डी की हत्या से अंग्रेजी शासन में हड़कंप मच गया। इसके बाद उससे भी अधिक कठोर अधिकारी राबर्ट डगलस को मिदनापुर भेजा गया। एक दिन जब डगलस अपने कार्यालय में बैठकर सरकारी फाइलें देख रहा था, तभी दो क्रांतिकारी वहां पहुंचे और उस पर गोलियां चला दीं। डगलस की मौके पर ही मौत हो गई।

घटना के बाद एक क्रांतिकारी भागने में सफल रहा, जबकि प्रद्योत कुमार पकड़े गए। अंग्रेजी शासन ने मुकदमे के बाद उन्हें फांसी की सजा दे दी।

इसके बावजूद अंग्रेज सरकार ने मिदनापुर में अपना दमन जारी रखा। इसके बाद बी.ई.जे. बर्ग को जिले का जिलाधिकारी बनाया गया। सुरक्षा के लिए बर्ग हमेशा दो अंगरक्षकों के साथ चलता था। दूसरी ओर, क्रांतिकारियों ने भी तय कर लिया था कि मिदनापुर में किसी अंग्रेज जिलाधिकारी को टिकने नहीं दिया जाएगा।

2 सितंबर 1933 को मिदनापुर के टाउन क्लब और मोहम्मदन स्पोर्टिंग के बीच फुटबॉल मुकाबला होना था। फुटबॉल प्रेमी बर्ग भी मैच से पहले मैदान में पहुंचा और अभ्यास में शामिल हो गया। वह अभ्यास के दौरान कुछ किक ही लगा पाया था कि दो खिलाड़ी उसके सामने आकर खड़े हो गए।

ये दोनों खिलाड़ी अनाथ बंधु पांजा और मृगेन्द्र कुमार दत्त थे। दोनों ने अपनी जेब से पिस्तौल निकाली और बर्ग पर गोलियां चला दीं। गोली लगने से बर्ग मैदान में गिर पड़ा और उसकी मौत हो गई।

इसके बाद बर्ग के अंगरक्षकों ने दोनों क्रांतिकारियों पर गोलियां चलानी शुरू कर दीं। अपनी पिस्तौलें खाली हो जाने के बाद दोनों ने वहां से निकलने की कोशिश की, लेकिन अंगरक्षकों की गोलियों से वे घायल होकर गिर पड़े। अनाथ बंधु पांजा ने मौके पर ही दम तोड़ दिया, जबकि गंभीर रूप से घायल मृगेन्द्र कुमार दत्त को अस्पताल ले जाया गया। अत्यधिक रक्तस्राव के कारण अगले दिन उनकी भी मृत्यु हो गई।

घटना के बाद पुलिस ने पूरे फुटबॉल मैदान को घेर लिया और खिलाड़ियों की तलाशी शुरू कर दी। तलाशी के दौरान निर्मल जीवन घोष, ब्रजकिशोर चक्रवर्ती और रामकृष्ण राय के पास भी पिस्तौलें मिलीं। बताया गया कि ये तीनों भी क्रांतिकारी संगठन से जुड़े थे और यदि अनाथ बंधु तथा मृगेन्द्र अपने अभियान में सफल नहीं होते, तो इन तीनों को बर्ग की हत्या की जिम्मेदारी निभानी थी।

पुलिस ने तीनों को गिरफ्तार कर उनके खिलाफ मुकदमा चलाया। बाद में उन्हें मिदनापुर केंद्रीय कारागार में फांसी दे दी गई।

मिदनापुर में लगातार तीन जिलाधिकारियों की हत्या के बाद अंग्रेजी प्रशासन को अपनी रणनीति बदलने के लिए मजबूर होना पड़ा। अंग्रेज अधिकारियों में मिदनापुर जाने को लेकर भय पैदा हो गया। आखिरकार प्रशासन ने तय किया कि अब वहां किसी भारतीय अधिकारी को जिलाधिकारी बनाकर भेजा जाएगा।

इस तरह अनाथ बंधु पांजा, मृगेन्द्र कुमार दत्त और उनके साथियों के बलिदान ने अंग्रेजी शासन के सामने बड़ी चुनौती खड़ी की। मिदनापुर की यह घटना स्वतंत्रता आंदोलन में उन युवाओं के साहस और बलिदान की याद दिलाती है, जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपने प्राणों की भी परवाह नहीं की।

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