सीतामढ़ी में मां सीता के जीवन चरित पर विचार गोष्ठी एवं कवि सम्मेलन का आयोजन

सीतामढ़ी। मां सीता के आदर्श जीवन, त्याग और सांस्कृतिक विरासत को जन-जन तक पहुंचाने के उद्देश्य से सीतामढ़ी स्थित फ्रंट एज स्कूल, हॉस्पिटल रोड में साहित्यकार विमल कुमार परिमल की अध्यक्षता में विचार गोष्ठी सह कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम सीता संवाद आध्यात्मिक एवं साहित्यिक यात्रा के तत्वावधान में आयोजित हुआ, जिसमें विद्वानों, साहित्यकारों, शिक्षकों और समाजसेवियों ने भाग लेकर माता सीता के जीवन के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला।

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता प्रोफेसर डॉ. राम विनय सिंह, संस्कृत विभाग, डीएवी पीजी कॉलेज, देहरादून ने अपने संबोधन में कहा कि महर्षि वाल्मीकि ने माता सीता को सर्वोच्च शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया है। उन्होंने कहा कि रामायण केवल भगवान राम की कथा नहीं, बल्कि माता सीता के व्यक्तित्व और उनके जीवन संघर्षों की भी महागाथा है। उनके अनुसार वाल्मीकि रामायण में सीता को केंद्र में रखकर कथा का विस्तार किया गया है, जबकि गोस्वामी तुलसीदास ने श्रीराम को मर्यादा पुरुषोत्तम और सर्वशक्तिमान ईश्वर के रूप में चित्रित किया, जिसके परिणामस्वरूप रामचरितमानस जन-जन की प्रिय कृति बन गई। हालांकि तुलसीदास ने माता सीता के जीवन के अनेक पक्षों को अपेक्षाकृत कम विस्तार दिया।

कार्यक्रम का संचालन करते हुए सीता संवाद आध्यात्मिक एवं साहित्यिक यात्रा के निदेशक आग्नेय कुमार ने कहा कि सीता जन्मभूमि पंच तीर्थ दर्शन स्थलों के समग्र विकास तक धर्मजागरण और जनजागरण अभियान निरंतर जारी रहेगा। उन्होंने बताया कि सीता जन्मभूमि यात्रा, मिथिला दर्शन यात्रा, सीताराम अवध गमन यात्रा, सीताराम लक्ष्मण वन गमन यात्रा तथा भूमिजा का भूमिगमन यात्रा जैसे धार्मिक और सांस्कृतिक अभियानों को पूर्ण करना संगठन का प्रमुख उद्देश्य है। उन्होंने कहा कि माता सीता के चरण जिन-जिन पवित्र स्थलों पर पड़े, उन सभी स्थानों के दर्शन, पूजन और संरक्षण का कार्य समाज के सहयोग से किया जाएगा।

अध्यक्षीय संबोधन में साहित्यकार विमल कुमार परिमल ने कहा कि माता सीता का जीवन त्याग, धैर्य, कर्तव्यनिष्ठा और स्वाभिमान का अद्भुत उदाहरण है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में बेटियों को माता सीता के जीवन से प्रेरणा लेने की आवश्यकता है। सीता ने मिथिला और अयोध्या दोनों कुलों का गौरव बढ़ाया तथा पतिव्रत धर्म का पालन करते हुए वनगमन किया। बाद में कठिन परिस्थितियों में रहते हुए उन्होंने लव-कुश का पालन-पोषण कर उन्हें स्वाभिमानी और संस्कारी बनाया। उनका संपूर्ण जीवन भारतीय नारी के लिए आदर्श प्रस्तुत करता है।

कार्यक्रम में संगठन के संरक्षक दिनेश चंद द्विवेदी ने सीता जन्मभूमि क्षेत्र में एक केंद्रीय विश्वविद्यालय स्थापित करने की मांग उठाई। उन्होंने वैदिक विश्वविद्यालय की स्थापना के माध्यम से चारों वेदों की प्राचीन शिक्षा परंपरा को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।

कवि सम्मेलन के दौरान अनेक कवियों ने माता सीता के जीवन से जुड़े प्रसंगों पर अपनी रचनाएं प्रस्तुत कीं। मुरलीधर झा मधुकर ने पुष्प वाटिका और गिरिजा पूजन प्रसंग पर आधारित कविता सुनाई। राम बाबू सिंह ने बाल्यकाल में धनुष के साथ खेलती वीरांगना सीता का चित्रण किया। सुरेश वर्मा ने अपनी कविता के माध्यम से माता सीता के त्याग और संघर्ष को शब्द दिए। वहीं जितेंद्र झा आजाद ने सीता स्वयंवर और जनकनंदिनी के दिव्य गुणों का भावपूर्ण वर्णन किया।

केंद्रीय विद्यालय सुतिहारा के संगीत शिक्षक संजय कुमार ने जानकी जन्मभूमि पुनौराधाम के विकास को लेकर अपनी रचना प्रस्तुत की। वहीं प्रधानाध्यापक संजय कुमार ने बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण में सादगी, सत्यनिष्ठा, आदर्श और नैतिक मूल्यों के महत्व पर प्रकाश डाला।

इस अवसर पर उषा शर्मा ने प्रकृति संरक्षण, स्वच्छता और हरित सीतामढ़ी के निर्माण को लेकर अपने विचार रखे। कवि राम किशोर सिंह चकवा ने अपनी कविता के माध्यम से कलियुग में बढ़ती बुराइयों से रक्षा के लिए माता सीता से प्रार्थना की।

कार्यक्रम में भूतपूर्व सैनिक संघ वेटरन्स इंडिया, सीतामढ़ी के संयोजक अनिल कुमार ने सीता संवाद द्वारा चलाए जा रहे धार्मिक एवं सांस्कृतिक अभियानों की सराहना करते हुए इसकी सफलता की कामना की।

इस अवसर पर डॉ. प्रतिमा आनंद, अनुरंजना भारद्वाज, विक्की आदित्य सिंह, संत भूषण दास, मुकेश झा, बीरेंद्र यादव, उमेश सिंह, भारती देवी और चंदन कुमार सहित बड़ी संख्या में गणमान्य लोग उपस्थित रहे और माता सीता के जीवन मूल्यों पर आधारित विचारों को सुना।

कार्यक्रम का समापन माता सीता के आदर्शों को समाज में प्रसारित करने और सीता जन्मभूमि के विकास हेतु सामूहिक संकल्प के साथ किया गया।

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