हरिश्चंद्र घाट पर रंगभरी एकादशी के पावन अवसर पर मसाने की होली का अद्भुत नजारा देखने को मिला। इस अनोखे उत्सव में चिता की भस्म से होली खेली गई, जिसने काशी की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परंपरा को एक बार फिर जीवंत कर दिया।
इस वर्ष भी मसाने की होली पूरे उल्लास और परंपरागत रीति-रिवाजों के साथ मनाई गई। यह पर्व केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि जीवन और मृत्यु के शाश्वत सत्य को दर्शाने वाला अनूठा आयोजन है।
राग और विराग का अद्भुत संगम
वाराणसी की सांस्कृतिक पहचान में मसाने की होली का विशेष स्थान है। यहां चिता भस्म से होली खेलने की परंपरा जीवन के नश्वर होने और मोक्ष की अवधारणा को दर्शाती है। यह आयोजन बताता है कि काशी में मृत्यु भी उत्सव का हिस्सा है और इसे भय नहीं, बल्कि आध्यात्मिक दृष्टि से देखा जाता है।
मसाने की होली के दौरान साधु-संत और श्रद्धालु एकत्र होकर भस्म और गुलाल के साथ उत्सव मनाते हैं। ढोल-नगाड़ों और हर-हर महादेव के जयघोष के बीच यह आयोजन भक्ति और वैराग्य का अनूठा अनुभव कराता है।
परंपरा और आस्था का प्रतीक
यह परंपरा काशी की उस मान्यता को दर्शाती है, जहां जीवन और मृत्यु के बीच कोई भेद नहीं माना जाता। मसाने की होली इस संदेश को मजबूत करती है कि मृत्यु अंत नहीं, बल्कि एक नई यात्रा की शुरुआत है।
रंगभरी एकादशी पर आयोजित यह पर्व काशी की धार्मिक विरासत, सांस्कृतिक विविधता और आध्यात्मिक गहराई को दुनिया के सामने प्रस्तुत करता है।
