हमारी परंपराओं में सद्भावना की ऐसी झलक दिखती है, जो हमें पूर्वजों से मिली धर्म निर्पेक्षता की सीख को प्रतिबिंबित करता है। सुल्तानगंज प्रखंड के तिलकपुर गांव स्थित सुप्रसिद्ध काली मंदिर की 200 वर्षों से चली आ रही परंपरा कुछ इसी तरह हमें सद्भावना की सीख देता है।
चैत्र के अंतिम मंगलवार को यहां आसपास के जिले ही नहीं झारखंड, बंगाल सहित नेपाल के लोग भी पूजा-अर्चना करने और मन्नत मांगने आते हैं। इस दिन गांव के मजार के फकीर मंदिर में पहली पूजा करते हैं। पवित्रता के साथ सुबह-सुबह ही फकीर अपने हाथों से खीर का प्रसाद बनाते हैं। फकीर के पूजा-अर्चना के बाद ही सामूहिक पूजा शुरू होती है।
मन्नत पूरा होने पर मुंडन संस्कार करवाने दूर-दूर से पहुंचे भक्त
प्रखंड क्षेत्र के तिलकपुर स्थित सुप्रसिद्ध काली मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। मंगलवार को मां काली की पूजा-अर्चना के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी। बिहार, झारखंड, बंगाल सहित नेपाल से आए श्रद्धालु मन्नत पूरी होने पर पहुंचे थे।
अपने-अपने संतानों का मुंडन संस्कार कराया और मां काली से सुख, समृद्धि की कामना की। जैसे-जैसे दिन ढलता गया, भीड़ बढ़ती गई। मंदिर के पुजारी ने बताया कि वर्षों पूर्व पूजा को लेकर मंदिर परिसर की साफ-सफाई की जा रही थी।
इसी दौरान करीब 20 भरी से अधिक सोने का चंद्रमणि हार व दो कंगन मिला था। उसी आभूषण से ही मां काली का श्रृंगार कर सुशोभित किया गया। इस मंदिर को आसपास के लोग सिद्ध पीठ मानते हैं।
एक दिन पूर्व गांव की महिलाएं करती हैं मजार पर जलाभिषेक
मंदिर के पुजारी ने बताया कि यहां विद्वान पंडितों द्वारा वैदिक मंत्रोच्चार, विधि-विधान से कलश स्थापना कर तीन दिवसीय अनुष्ठान की शुरुआत की जाती है। स्थापना काल से ही परंपरा है कि अनुष्ठान से एक दिन पूर्व अर्थात सोमवार को गांव की महिलाओं द्वारा मजार पर पूजा-पाठ कर जलाभिषेक किया जाता है।
इसके बाद महिलाएं पुनः गंगा स्नान कर दो कलश में गंगाजल भर कर मंदिर पहुंचती हैं। स्थानीय मुस्लिम समुदाय के फकीर पीतल के बर्तन में मैया के भोग के लिए खीर बनाते हैं। माता की प्रथम पूजा करने के बाद उन्होंने खीर का भोग लगाया।
फकीर के द्वारा पूजा संपन्न होने के बाद माता की पूजा के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी। मान्यता है कि यहां मांगी हुई मुरादें अवश्य पूरी होती है।
