मधुबनी, 04 नवंबर 2026। कला एवं संस्कृति विभाग, बिहार सरकार तथा जिला प्रशासन, मधुबनी के संयुक्त तत्वावधान में जिला परिषद परिसर स्थित आम्रपाली कला प्रशिक्षण केंद्र, मधुबनी में महाकवि विद्यापति के गीतों पर आधारित चार दिवसीय कार्यशाला का शुभारंभ बुधवार को समारोहपूर्वक किया गया। कार्यक्रम का उद्घाटन उपस्थित अतिथियों द्वारा संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित कर किया गया।
उद्घाटन समारोह में जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी श्री नीतीश कुमार, साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित प्रख्यात साहित्यकार श्री अजीत आजाद एवं सेवानिवृत्त प्राचार्य, कालिदास विद्यापीठ महाविद्यालय, बेनीपट्टी के श्री सुभ वर्णवाल, संगीत अनुरागी एवं प्रख्यात संगीतज्ञ श्री जटाधर पासवान, कीर्तन शिक्षण-प्रशिक्षण केंद्र के प्रशिक्षक एवं वरिष्ठ नाट्य कलाकार श्री महेंद्र लाल कर्ण , वरिष्ठ पत्रकार श्री शैलेन्द्र कुमार तथा कार्यशाला के प्रशिक्षक पंडित राधा मोहन मिश्र उपस्थित रहे।
कार्यक्रम के प्रथम सत्र की शुरुआत जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी श्री नीतीश कुमार के स्वागत संबोधन से हुई। उन्होंने सभी अतिथियों एवं प्रतिभागियों का स्वागत एवं अभिनंदन करते हुए महाकवि, कवि कोकिल विद्यापति के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने विद्यापति की आध्यात्मिक चेतना, उनकी रचनाओं के भाव पक्ष तथा पदावली की साहित्यिक एवं सांगीतिक विशेषताओं को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि विद्यापति की रचनाएं मिथिला की सांस्कृतिक पहचान और आध्यात्मिक विरासत की अमूल्य धरोहर हैं, जिन्हें नई पीढ़ी तक पहुंचाना आवश्यक है।
इसके पश्चात साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित साहित्यकार श्री अजित आजाद ने विद्यापति संगीत की महत्ता पर विस्तार से अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार रवींद्र संगीत को एक विशिष्ट पहचान एवं प्रतिष्ठा प्राप्त है, उसी प्रकार विद्यापति संगीत को भी व्यापक पहचान दिलाने की दिशा में अग्रतर प्रयास किए जाने चाहिए। उन्होंने विशेष रूप से सुझाव दिया कि विद्यापति संगीत की अपनी एक विशिष्ट एवं मानक धुन विकसित की जानी चाहिए, ताकि धुन सुनते ही श्रोता को विद्यापति संगीत की पहचान हो सके। इसके लिए इसके सांगीतिक स्वरूप को व्यवस्थित रूप से विकसित एवं प्रचारित करने की आवश्यकता है।
अगले वक्ता के रूप में प्रख्यात संगीतज्ञ एवं संगीत अनुरागी श्री जटाधर पासवान ने लोकसंगीत और विद्यापति संगीत के आपसी संबंधों पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि विद्यापति संगीत और लोकसंगीत के बीच गहरा साम्य दिखाई देता है। लोकगीतों में समाज की परिस्थितियों, अनुभवों और विसंगतियों पर सहज भाषा में कटाक्ष किया जाता है। उदाहरणस्वरूप ‘पिया मोरे बालक’ जैसे लोकगीतों में सामाजिक संदर्भ और व्यंग्य का भाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि लोकगीत आम जनजीवन और समाज से सीधे जुड़े होते हैं तथा इनमें आम बोलचाल की भाषा का अधिक प्रयोग होता है। वहीं, विद्यापति द्वारा रचित पदों में एक विशिष्ट काव्यात्मक शब्दावली एवं भाषा का प्रयोग मिलता है। उन्होंने मैथिली की लोकभाषा में प्रचलित ‘गे रे ऐलो’, ‘खैलो’ जैसे शब्दों के प्रयोग का उल्लेख करते हुए कहा कि लोकभाषा की सहजता और विद्यापति पदावली की विशिष्ट भाषा दोनों की अपनी अलग विशेषताएं हैं। उनके अनुसार लोकसंगीत और विद्यापति संगीत को एक-दूसरे से अलग करके नहीं, बल्कि उनके पारस्परिक सांस्कृतिक संबंधों के संदर्भ में भी समझने की आवश्यकता है।
तत्पश्चात कीर्तन शिक्षण-प्रशिक्षण केंद्र के प्रशिक्षक एवं वरिष्ठ नाट्य कलाकार श्री महेंद्र लाल कर्ण ने विद्यापति को केवल एक कवि के रूप में देखने के बजाय उनके गीतों को सामाजिक संदर्भों में समझने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि विद्यापति के पदों में तत्कालीन समाज, जीवन-मूल्यों एवं सामाजिक परिस्थितियों की अभिव्यक्ति भी देखने को मिलती है। उन्होंने सुझाव दिया कि जिस प्रकार अन्य सांस्कृतिक एवं साहित्यिक विधाओं के लिए सीसीआरटी (CCRT) के माध्यम से फेलोशिप एवं शोधवृत्तियां प्रदान की जाती हैं, उसी प्रकार विद्यापति संगीत पर भी शोध एवं अध्ययन के लिए विशेष फेलोशिप की व्यवस्था की जानी चाहिए, ताकि इस विशिष्ट सांगीतिक परंपरा पर गंभीर शोध कार्य को प्रोत्साहन मिल सके।
कार्यशाला के प्रशिक्षक प्रख्यात संगीतज्ञ पंडित राधा मोहन मिश्र ने अपने संबोधन में महाकवि विद्यापति के साहित्यिक एवं सांगीतिक व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि राजा शिवसिंह द्वारा सम्मानित विद्यापति केवल एक कवि ही नहीं, बल्कि एक कुशल संगीतज्ञ भी थे। उनकी काव्य प्रतिभा और संगीत साधना के कारण ही उन्हें ‘कवि कोकिल’ के नाम से जाना जाता है। उन्होंने कहा कि विद्यापति के पदों में काव्य, संगीत, भक्ति और भावों का अद्भुत
समन्वय मिलता है। इस कार्यशाला के माध्यम से प्रतिभागियों को विद्यापति के गीतों की गायन परंपरा एवं सांगीतिक बारीकियों से परिचित कराया जाएगा।
प्रथम सत्र में सभी अतिथियों ने विद्यापति संगीत के संरक्षण, संवर्धन, शोध एवं व्यापक प्रचार-प्रसार की आवश्यकता पर अपने विचार साझा किए।
इसके पश्चात द्वितीय सत्र में पंडित राधा मोहन मिश्र के निर्देशन में विद्यापति गीतों का व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रारंभ किया गया। कार्यशाला में प्रतिभागियों को विद्यापति पदावली के गायन, स्वर, लय, भावाभिव्यक्ति एवं पारंपरिक सांगीतिक शैली का प्रशिक्षण दिया जाएगा।
उल्लेखनीय है कि यह कार्यशाला दिनांक 04 नवंबर से 07 नवंबर 2026 तक आयोजित की जा रही है। आगामी चार दिनों तक पंडित राधा मोहन मिश्र प्रशिक्षक के रूप में प्रतिभागियों को व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान करेंगे। इस पहल का उद्देश्य मिथिला की समृद्ध सांस्कृतिक एवं सांगीतिक विरासत को संरक्षित करते हुए नई पीढ़ी को महाकवि विद्यापति की अमूल्य रचनात्मक परंपरा से जोड़ना है।
