नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने नीतीश कटारा हत्या मामले में दोषी करार दिए गए विकास यादव की तीन सप्ताह की फरलो देने की मांग वाली याचिका बुधवार को खारिज कर दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि जेल महानिदेशक द्वारा फरलो अर्जी अस्वीकार करने के आदेश में न तो कोई मनमानी पाई गई और न ही याचिकाकर्ता के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ है।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि संबंधित प्राधिकार द्वारा पारित निर्णय विधिसम्मत प्रक्रिया के तहत लिया गया है। ऐसे में न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं बनती। कोर्ट ने यह भी माना कि फरलो का अधिकार पूर्णतः स्वचालित या अनिवार्य नहीं है, बल्कि यह परिस्थितियों और आचरण के मूल्यांकन पर आधारित एक विवेकाधीन राहत है।

जेल प्रशासन के निर्णय को ठहराया सही

विकास यादव ने 29 अक्टूबर 2025 को जारी उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें जेल अधिकारियों ने उनकी फरलो याचिका को अस्वीकार कर दिया था। याचिका में तीन सप्ताह की अस्थायी रिहाई की मांग की गई थी।

फरलो एक प्रकार की अस्थायी रिहाई होती है, जो सजा को न तो समाप्त करती है और न ही निलंबित। यह सामान्यतः उन कैदियों को दी जाती है, जिन्होंने लंबी अवधि की सजा काट ली हो और जिनका जेल में आचरण संतोषजनक रहा हो। हालांकि इसका अनुमोदन प्रशासनिक मूल्यांकन और निर्धारित मानकों पर निर्भर करता है।

हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि जेल प्रशासन द्वारा आवेदन अस्वीकार करने का निर्णय स्थापित नियमों और तथ्यों के आधार पर लिया गया था। इसलिए इसे निरस्त करने का कोई आधार नहीं बनता।

नीतीश कटारा हत्याकांड का पृष्ठभूमि

वर्ष 2002 में नीतीश कटारा का अपहरण कर हत्या कर दी गई थी। जांच और सुनवाई के बाद विकास यादव को इस मामले में दोषी ठहराया गया। अभियोजन के अनुसार, नीतीश कटारा का विकास यादव की बहन के साथ संबंध होने के कारण यह अपराध अंजाम दिया गया था। यह मामला देश के चर्चित ऑनर किलिंग मामलों में से एक रहा है।

हाईकोर्ट के ताजा आदेश के बाद विकास यादव को फिलहाल फरलो पर रिहाई की राहत नहीं मिलेगी।

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