लखनऊ। रसूलपुर टिकनिया मऊ गांव में दलित परिवार के मकान को गिराए जाने के नोटिस ने स्थानीय ग्रामीणों और राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन को एकजुट कर दिया। यह मामला संतोष कुमार के मकान से जुड़ा है, जो एक दलित परिवार के लिए न केवल छत है, बल्कि उनके पूर्वजों की स्मृतियों का प्रतीक भी है। तहसील प्रशासन द्वारा 4 जनवरी को जारी किए गए नोटिस के बाद ग्रामीणों और संगठन के पदाधिकारियों ने विरोध दर्ज करने के लिए मौके पर इकट्ठा होकर प्रशासन की मंशा पर सवाल उठाए।
मामले की पृष्ठभूमि
संतोष कुमार का मकान जिस जमीन पर स्थित है, वह उनके परिवार के लिए वर्षों से एकमात्र आश्रय स्थल है। संतोष कुमार ने बताया कि यह भूमि उनके पिता की स्मृतियों से जुड़ी है और इस पर उनके पिता की समाधि भी बनी हुई है। प्रशासन द्वारा जारी नोटिस में मकान को गिराने का आदेश दिया गया, जिससे यह आशंका जताई जा रही है कि यह कदम किसी प्रॉपर्टी डीलर को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से उठाया गया है।
राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन के जिला अध्यक्ष प्रमोद यादव ने इसे दलितों के अधिकारों का हनन और न्याय की अवहेलना करार दिया। उन्होंने कहा, “देश और प्रदेश की सरकारें जहां एक ओर गरीबों और दलितों को आवासीय भूमि और मकान प्रदान करने की योजनाएं चला रही हैं, वहीं दूसरी ओर प्रशासन द्वारा इस तरह के कदम उठाना न केवल निंदनीय है, बल्कि समाज के कमजोर वर्गों के साथ अन्याय भी है।”
ग्रामीणों और संगठन का एकजुटता प्रदर्शन
तहसील प्रशासन द्वारा नोटिस दिए जाने के बाद, 10 जनवरी को संतोष कुमार के मकान के पास सैकड़ों ग्रामीण और संगठन के पदाधिकारी एकत्र हुए। मौके पर मौजूद संगठन के जिला महामंत्री रामसिंह, ब्लॉक अध्यक्ष बब्लू, और महिला टीम की अध्यक्ष अंजू देवी ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। उन्होंने इस मुद्दे को न्यायालय में लंबित मामला बताते हुए प्रशासन से अपील की कि मकान गिराने की कार्रवाई तुरंत रोकी जाए।
संगठन के सदस्यों ने यह स्पष्ट किया कि जब तक न्यायालय का अंतिम निर्णय नहीं आ जाता, तब तक मकान को गिराने की अनुमति नहीं दी जाएगी। मौके पर मौजूद गांववासियों ने भी इस फैसले के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की और संतोष कुमार के साथ खड़े होने का वादा किया।
प्रशासन की अनुपस्थिति पर सवाल
प्रदर्शन के दौरान यह देखा गया कि तहसील प्रशासन का कोई भी अधिकारी मौके पर नहीं पहुंचा। यह प्रशासन की गंभीरता और पारदर्शिता पर सवाल खड़े करता है। जिला अध्यक्ष प्रमोद यादव ने कहा, “प्रशासन की चुप्पी यह दिखाती है कि उनके इरादे साफ नहीं हैं। यदि प्रशासन को अपनी मंशा पर भरोसा है, तो उन्हें यहां आकर जनता के सवालों का जवाब देना चाहिए।”
दलित अधिकार और सामाजिक न्याय की लड़ाई
संतोष कुमार का मामला केवल एक व्यक्ति का नहीं है, बल्कि यह दलित अधिकार और सामाजिक न्याय की व्यापक लड़ाई का हिस्सा है। देश में ऐसे कई उदाहरण हैं जहां दलितों और कमजोर वर्गों के साथ अन्याय होता है। यह घटना इस बात की ओर इशारा करती है कि प्रशासनिक प्रक्रियाओं में सुधार की कितनी आवश्यकता है।
राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन के पदाधिकारियों ने इस मुद्दे को लेकर सरकार से भी अपील की है। उन्होंने कहा कि यदि प्रशासन ने मकान गिराने की कार्रवाई की तो यह मामला बड़े स्तर पर विरोध का कारण बन सकता है। संगठन ने चेतावनी दी कि वे इस मुद्दे को लेकर मुख्यमंत्री कार्यालय तक जाएंगे और जरूरत पड़ी तो दिल्ली में भी प्रदर्शन करेंगे।
महिलाओं की भूमिका
इस विरोध प्रदर्शन में महिलाओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। महिला टीम की अध्यक्ष अंजू देवी ने कहा, “हमारे गांव की महिलाएं इस अन्याय को सहन नहीं करेंगी। यह केवल संतोष कुमार का मकान नहीं है, यह हमारे गांव की अस्मिता और अधिकारों का प्रतीक है।”
आगे की रणनीति
राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन ने घोषणा की है कि यदि प्रशासन ने मकान गिराने की कार्रवाई की, तो वे इसे कानूनी और सामाजिक दोनों स्तरों पर चुनौती देंगे। संगठन के सदस्यों ने कहा कि वे गांववासियों के साथ मिलकर एकजुट रहेंगे और संतोष कुमार के परिवार को न्याय दिलाने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे।
निष्कर्ष
यह मामला केवल एक दलित परिवार के मकान का नहीं है, बल्कि यह सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, और प्रशासनिक पारदर्शिता का भी मुद्दा है। राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन और ग्रामीणों की एकजुटता यह दर्शाती है कि जब समाज के कमजोर वर्गों के अधिकारों पर हमला होता है, तो समाज के सभी वर्ग एकजुट होकर इसके खिलाफ खड़े होते हैं।
सरकार और प्रशासन को चाहिए कि वे इस मामले को गंभीरता से लें और न्याय सुनिश्चित करें। यदि संतोष कुमार के मकान को गिराने की कार्रवाई होती है, तो यह न केवल एक परिवार के लिए त्रासदी होगी, बल्कि यह समाज के कमजोर वर्गों के अधिकारों पर एक और चोट होगी।