खगड़िया के केले की अपनी पहचान है। प्रधानमंत्री एक जिला एक उत्पाद योजना के तहत खगड़िया में केला शामिल है। यहां मुख्य रूप से गोगरी और परबत्ता प्रखंड में केले की खेती होती है। परंतु पनामा बिल्ट अर्थात गलुआ रोग के कारण धीरे-धीरे किसान केले की खेती छोड़ रहे हैं।

केले की खेती का रकबा सिमटता जा रहा है। किसान केले की खेती छोड़कर मक्का की खेती को अपना रहे हैं। कहने का मतलब केले की बीमारी (पनामा बिल्ट) से किसान केले की खेती छोड़ रहे हैं, परंतु मक्का ने उन्हें सहारा दिया है।

जानिए, केले और मक्का की खेती का अर्थशास्त्र

जिले में आज भी सर्वाधिक केले की खेती परबत्ता प्रखंड के कुल्हड़िया पंचायत में होती है। पूर्व में यहां दो सौ एकड़ के आसपास केले की खेती होती थी, परंतु अब रकबा सिमट कर सौ एकड़ के आसपास पहुंच गया है।

कुल्हड़िया के किसान मुरारी तिवारी ने बताया कि पहले छह एकड़ में केले की खेती करते थे, लेकिन केले की फसल पर गलुआ रोग का प्रभाव बढ़ा। जिसके बाद अब मात्र दो एकड़ में केले की खेती कर रहे हैं। शेष में मक्का की खेती कर रहे हैं। मक्का ही अब मुख्य सहारा है।

मुरारी तिवारी के अनुसार एक एकड़ केले की खेती (रविष्टा प्रभेद) में 75-80 हजार से लेकर एक लाख तक की लागत आती है। और शुद्ध मुनाफा दो लाख तक के आसपास होता है, जबकि जी-नाइन प्रभेद में डेढ़ लाख के आसपास लागत आती है और शुद्ध मुनाफा तीन लाख के आसपास होता है।

एक एकड़ मक्का की खेती में लागत 17 से 25-30 हजार तक के आसपास बैठता है, जबकि शुद्ध मुनाफा 50 हजार के आसपास होता है। अगर बाजार मूल्य ठीक-ठाक रहा, तो मुनाफा बढ़कर 70 हजार के आसपास भी पहुंच जाता है।

कुल्हड़िया के ही किसान अजय तिवारी ने बताया कि पहले पांच एकड़ में केले की खेती करते थे, लेकिन ‘केले के कैंसर’ के नाम से विख्यात पनामा बिल्ट अर्थात गलुआ रोग के कारण अब इसकी खेती मात्र 10 कट्ठा में करते हैं। अब हमलोगों का सहारा मक्का की फसल है।

मक्का में मुनाफा अपेक्षाकृत केले से कम है, परंतु जोखिम भी बहुत कम है। केले की फसल की देख-रेख साल भर करनी पड़ती है, परंतु मक्का तो एक मौसम की खेती है। मुख्य रूप से रबी में इसकी खेती होती है।

गोगरी प्रखंड के पितौंझिया गांव निवासी किसान रामकिशोर भी केले की खेती अब लगभग छोड़कर मक्का की खेती को अपना लिए हैं। रामकिशोर कहते हैं- मक्का की खेती में ‘माथापच्ची’ कम है। रबी के मौसम में इसकी खेती करते हैं। चार एकड़ में भी मक्का लगाते हैं, तो कम से कम दो लाख शुद्ध बचत हो जाती है। दाल-रोटी चल जाती है।

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