क्या माता-पिता द्वारा अपनी पुत्री का दान धर्म और विधि सम्मत है?

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प्रयागराज महाकुम्भ में घटी एक घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। यह घटना न केवल हमारे समाज के धार्मिक और नैतिक मूल्यों को सवालों के घेरे में लाती है, बल्कि भारतीय कानून और मानवाधिकारों की स्थिति पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करती है।

आगरा की एक मासूम कक्षा 9 की छात्रा, जिसने बचपन से आईएएस अधिकारी बनने का सपना देखा था, उसे उसके माता-पिता ने “प्रभु की इच्छा” मानते हुए जूना अखाड़ा को सौंप दिया। इस घटना ने न केवल उस बच्ची के भविष्य को प्रभावित किया है, बल्कि समाज में एक नई बहस को जन्म दिया है – क्या किसी माता-पिता को अपनी संतान का दान करने का अधिकार है? क्या यह धर्म और कानून के मानकों के अनुरूप है?


घटना का विवरण

प्रयागराज महाकुम्भ में यह घटना तब घटी जब जूना अखाड़ा में प्रवास कर रही रीमा सिंह, जो बच्ची की मां हैं, ने बताया कि अखाड़े के महंत कौशल गिरि महाराज पिछले तीन वर्षों से उनके गांव में भागवत कथा सुनाने आते रहे हैं। महंत के प्रभाव में आकर उन्होंने अपनी पुत्री को “प्रभु की सेवा” के लिए समर्पित कर दिया।

यह निर्णय न केवल बच्ची के अधिकारों का उल्लंघन करता है, बल्कि समाज में माता-पिता की भूमिका और जिम्मेदारियों पर भी सवाल उठाता है।


क्या संतान का दान धर्म सम्मत है?

भारतीय धर्म और संस्कृति में संतान को भगवान का वरदान माना गया है। प्राचीन ग्रंथों में संतान को पालने और उसकी शिक्षा-दीक्षा की जिम्मेदारी माता-पिता की बताई गई है। लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि संतान का “दान” किया जा सकता है?

धार्मिक दृष्टिकोण

  1. सनातन धर्म: सनातन धर्म में संतान को भगवान की अमूल्य देन माना गया है। धर्मशास्त्रों में कहीं भी यह उल्लेख नहीं है कि संतान को वस्तु की तरह दान किया जा सकता है।
  2. धर्म के ठेकेदारों की भूमिका: महाकुम्भ जैसे धार्मिक आयोजनों में हजारों संत और शंकराचार्य उपस्थित रहते हैं। फिर भी, इस प्रकार की घटनाओं पर उनकी चुप्पी सवाल खड़े करती है।

नैतिकता और धर्म

धर्म का मूल उद्देश्य मानवता की सेवा और नैतिकता का पालन करना है। यदि धर्म के नाम पर किसी नाबालिग बच्ची का भविष्य छीन लिया जाए, तो यह धर्म नहीं, बल्कि अंधविश्वास और अज्ञानता का प्रतीक है।


क्या यह विधि सम्मत है?

भारतीय कानून किसी भी व्यक्ति को अपनी संतान को “दान” करने का अधिकार नहीं देता।

भारतीय कानून के प्रावधान

  1. बाल अधिकार संरक्षण अधिनियम, 2005: यह अधिनियम नाबालिग बच्चों के अधिकारों की रक्षा करता है।
  2. मानव तस्करी रोकथाम अधिनियम: किसी भी व्यक्ति, विशेष रूप से नाबालिग, को जबरन किसी संस्था या व्यक्ति को सौंपना कानूनन अपराध है।
  3. संविधान का अनुच्छेद 21: यह हर व्यक्ति को जीने का अधिकार प्रदान करता है।

सरकार और प्रशासन की चुप्पी

इस घटना पर प्रशासन और कानून प्रवर्तन एजेंसियों की चुप्पी भी चिंताजनक है। ऐसे मामलों में त्वरित कार्रवाई की आवश्यकता होती है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि किसी भी नाबालिग के अधिकारों का उल्लंघन न हो।


सामाजिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव

  1. बच्ची के भविष्य पर प्रभाव:
    • उसकी शिक्षा और करियर के सपने चकनाचूर हो गए।
    • यह घटना उसके मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव डाल सकती है।
  2. समाज पर प्रभाव:
    • इस घटना ने समाज में माता-पिता की जिम्मेदारियों और उनकी सोच पर सवाल खड़े किए हैं।
    • यह घटना एक खतरनाक उदाहरण पेश करती है, जिससे अन्य लोग भी प्रभावित हो सकते हैं।

समाधान और सुझाव

  1. कानूनी कार्रवाई:
    • इस घटना की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
    • दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए।
  2. सामाजिक जागरूकता:
    • माता-पिता को उनके अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूक किया जाना चाहिए।
    • धर्म और अंधविश्वास के बीच के अंतर को स्पष्ट करने के लिए शिक्षा अभियान चलाए जाने चाहिए।
  3. धार्मिक संगठनों की जिम्मेदारी:
    • धार्मिक संस्थानों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनके नाम पर कोई भी अनैतिक कार्य न हो।

निष्कर्ष

यह घटना न केवल एक बच्ची के अधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि समाज, धर्म, और कानून के लिए एक गंभीर चेतावनी भी है। यह समय है कि हम धर्म और कानून के बीच संतुलन बनाएं और यह सुनिश्चित करें कि कोई भी नाबालिग बच्चा अपने माता-पिता या समाज की गलत धारणाओं का शिकार न बने।

धर्म का असली उद्देश्य मानवता की सेवा है, न कि किसी के अधिकारों का हनन। कानून को सख्ती से लागू करना और समाज को जागरूक करना ही इस प्रकार की घटनाओं को रोकने का एकमात्र तरीका है।

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