अघोरी परंपरा: धर्म और मानसिकता के नाम पर अंधविश्वास का महिमामंडन

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भारत एक ऐसा देश है जो अपनी धार्मिक विविधता और आध्यात्मिक परंपराओं के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है। लेकिन कभी-कभी, कुछ परंपराएँ और प्रथाएँ ऐसी होती हैं जो न केवल मानवता के मूल्यों को चुनौती देती हैं, बल्कि समाज में अंधविश्वास और मानसिक विकृति को भी बढ़ावा देती हैं। अघोरी परंपरा इन्हीं में से एक है। इस लेख में हम अघोरी परंपरा, उसके मूल, उसके सामाजिक और धार्मिक प्रभाव, और उसके नाम पर होने वाले पाखंड का विश्लेषण करेंगे।

अघोरी कौन हैं?

अघोरी एक विशेष प्रकार के साधु होते हैं जो शैव परंपरा का पालन करते हैं। यह माना जाता है कि वे भगवान शिव के भक्त हैं और उनकी साधना का उद्देश्य मोक्ष प्राप्त करना है। अघोरी साधुओं की जीवनशैली और उनके कर्मकांड उन्हें अन्य साधुओं से अलग बनाते हैं।

अघोरी साधु अक्सर श्मशान घाटों में रहते हैं और शवों के बीच साधना करते हैं। उनकी साधना में शवों का उपयोग, मानव अस्थियों से बने आभूषण, और मांसाहार जैसी गतिविधियाँ शामिल होती हैं। वे सामाजिक मानदंडों और स्वच्छता के नियमों का पालन नहीं करते और अक्सर नशे में रहते हैं।

अघोरी परंपरा का इतिहास और मूल

अघोरी परंपरा का मूल तंत्र और शैव परंपरा में मिलता है। यह माना जाता है कि भगवान शिव “अघोर” रूप में सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापी हैं। अघोरी साधु इस विश्वास को मानते हैं कि भगवान शिव की पूजा के लिए किसी भी प्रकार की बाधा नहीं होनी चाहिए।

हालांकि, यह परंपरा समय के साथ विकृत हो गई और इसमें ऐसी प्रथाएँ शामिल हो गईं जो न केवल असामान्य हैं, बल्कि मानव गरिमा के विरुद्ध भी हैं।

अघोरी परंपरा के विवादास्पद पहलू

1. मूत्र, मल और खून का सेवन

अघोरी साधु यह मानते हैं कि हर चीज भगवान का प्रसाद है और उसे स्वीकार करना चाहिए। इस विचारधारा के तहत वे मूत्र, मल और खून का सेवन करते हैं। लेकिन यह कृत्य न तो किसी धर्म का हिस्सा है और न ही आध्यात्मिकता का प्रतीक। यह केवल मानसिक विकृति और अज्ञानता का परिणाम है।

2. शव साधना और मांसाहार

श्मशान में साधना करना और शवों का उपयोग करना अघोरियों की प्रमुख विशेषता है। वे शवों का मांस खाते हैं और मानते हैं कि इससे उन्हें अलौकिक शक्तियाँ प्राप्त होती हैं। लेकिन यह प्रथा न केवल समाज के लिए भयावह है, बल्कि इससे कई स्वास्थ्य समस्याएँ भी उत्पन्न हो सकती हैं।

3. गंदगी और स्वच्छता का अभाव

अघोरी साधु जानबूझकर गंदगी में रहते हैं और स्वच्छता के नियमों का पालन नहीं करते। वे यह मानते हैं कि स्वच्छता का कोई महत्व नहीं है और यह केवल सांसारिक मोह है। लेकिन यह विचारधारा न केवल उनके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, बल्कि समाज में भी नकारात्मक संदेश फैलाती है।

धार्मिकता और मानसिकता का महिमामंडन

अघोरी परंपरा को धार्मिक और आध्यात्मिक कहकर महिमामंडित करना एक बड़ी समस्या है। जो लोग इन प्रथाओं का समर्थन करते हैं, वे दरअसल अंधविश्वास और मानसिक विकृति को बढ़ावा देते हैं। धर्म का असली उद्देश्य मानवता, नैतिकता, और स्वच्छता को बढ़ावा देना है। ऐसे कृत्य, जो मानव गरिमा को ठेस पहुँचाते हैं और समाज में भय और अंधविश्वास फैलाते हैं, किसी भी सूरत में धर्म का हिस्सा नहीं हो सकते।

सरकारी समर्थन और संसाधनों की बर्बादी

कुंभ मेले और अन्य धार्मिक आयोजनों में अघोरियों को प्रमुखता दी जाती है। सरकार द्वारा उनके लिए भारी धनराशि खर्च की जाती है। यह धनराशि अगर शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वच्छता जैसे क्षेत्रों में लगाई जाए तो समाज को अधिक लाभ हो सकता है।

समाज पर प्रभाव

अघोरी परंपरा का समाज पर कई नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

  1. अंधविश्वास का प्रचार: अघोरी परंपरा को आध्यात्मिक कहकर महिमामंडित करना अंधविश्वास को बढ़ावा देता है।
  2. स्वास्थ्य समस्याएँ: गंदगी और अस्वच्छता के कारण बीमारियाँ फैल सकती हैं।
  3. भय और असुरक्षा: शव साधना और अन्य असामान्य गतिविधियों के कारण समाज में भय का माहौल बनता है।
  4. धार्मिक पाखंड: धर्म के नाम पर ऐसी प्रथाओं को बढ़ावा देना धार्मिकता का मजाक उड़ाने जैसा है।

समाधान और जागरूकता

  1. शिक्षा का प्रचार: अंधविश्वास को खत्म करने के लिए शिक्षा का प्रचार-प्रसार करना जरूरी है।
  2. धार्मिक सुधार: धार्मिक संस्थाओं को आगे आकर ऐसी प्रथाओं के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए।
  3. सरकारी नीति: सरकार को अघोरी परंपरा के नाम पर होने वाले पाखंड को खत्म करने के लिए सख्त कदम उठाने चाहिए।
  4. जनजागरूकता: समाज में जागरूकता फैलाना जरूरी है ताकि लोग इन प्रथाओं के पीछे के अंधविश्वास को समझ सकें।

निष्कर्ष

अघोरी परंपरा एक ऐसी प्रथा है जो धार्मिकता और आध्यात्मिकता के नाम पर समाज में अंधविश्वास और मानसिक विकृति को बढ़ावा देती है। यह जरूरी है कि हम धर्म के असली उद्देश्य को समझें और ऐसे कृत्यों का विरोध करें जो मानवता, नैतिकता और स्वच्छता के मूल्यों के खिलाफ हों। समाज को इन पाखंडों से बाहर निकालने के लिए शिक्षा, जागरूकता और सुधार की दिशा में कदम उठाने की जरूरत है।

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