100 साल पुरानी विवाह परंपराओं और आज के आधुनिक विवाहों के बीच एक तुलनात्मक और आलोचनात्मक विश्लेषण !

शादी की बदलती संस्कृति: बौद्धिक विमर्श से शोर-शराबे तक का सफर
आज से सौ साल पहले विवाह केवल दो परिवारों का मिलन या प्रदर्शन की वस्तु नहीं था, बल्कि वह एक बौद्धिक और सांस्कृतिक उत्सव था। ‘शास्त्रार्थ’ की परंपरा यह सोचने पर मजबूर करती है कि हमने प्रगति के नाम पर क्या खोया और क्या पाया है।

  1. बौद्धिक मनोरंजन बनाम व्यावसायिक शोर
    पुराने समय में ‘द्वारचार’ के बाद वर और कन्या पक्ष के पुरोहितों के बीच शास्त्रार्थ होता था। यह एक ऐसा समय था जब मनोरंजन का आधार ज्ञान, तर्क और भाषा की शुद्धता थी।

तब: लोग संस्कृत के श्लोकों और व्याकरण की बारीकियों पर चर्चा सुनकर आनंदित होते थे। यह समाज की बौद्धिक गहराई को दर्शाता था।

अब: आज शास्त्रार्थ की जगह ‘डीजे’ और ‘लाउडस्पीकर’ ने ले ली है। मनोरंजन अब मानसिक तृप्ति के बजाय शारीरिक थकान और कान फोड़ू शोर तक सीमित हो गया है।

  1. शिष्टाचार की गरिमा और ‘ईगो’ का टकराव
    बारातियों और घरातियों के बीच संवाद को ‘शिष्टाचार’ कहा जाता था। श्लोकों के माध्यम से एक-दूसरे का सम्मान करना और विनम्रता से तर्क करना एक उच्च सामाजिक आदर्श था।

तुलना: आज के विवाहों में ‘शिष्टाचार’ अक्सर दिखावे और लेन-देन की भेंट चढ़ जाता है। विनम्र संवाद की जगह अब फोटो खिंचवाने की होड़ और सोशल मीडिया पर ‘चेक-इन’ करने की व्याकुलता ने ले ली है।

  1. समय की अवधारणा: ठहराव बनाम जल्दबाजी
    पहले के समय में बारातें दो-दो दिन रुकती थीं। लोग एक-दूसरे को जानने, स्थानीय संगीत (जैसे धोबी नाच) और लोक परंपराओं का आनंद लेने का समय निकालते थे।

आलोचनात्मक पक्ष: आज शादियां ‘इवेंट मैनेजमेंट’ बन गई हैं। कुछ ही घंटों में रस्मों को निपटाकर लोग घर भागने की जल्दी में होते हैं। इस भागदौड़ में विवाह की वह ‘आत्मा’ लुप्त हो गई है जो रिश्तों को गहराई देती थी।

  1. सांस्कृतिक विलोपन (Cultural Erosion)
    आज विवाह का सांस्कृतिक स्वरूप पूरी तरह नष्ट हो गया है।

विलुप्त परंपराएं: सुमित्रानंदन पंत द्वारा वर्णित लोक विधाएं और पुरोहितों के बीच होने वाली वह बौद्धिक प्रतिस्पर्धा अब इतिहास के पन्नों में दफन है। हम आधुनिक तो हुए, लेकिन अपनी जड़ों से कट गए।

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