सीतामढ़ी। श्री सीताराम महावीर मंदिर, तिलक ताजपुर एवं सीता संवाद, सीतामढ़ी के संयुक्त तत्वावधान में मारुति मेधा सम्मान-सह-तुलसी जन्मोत्सव समारोह का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता उमा शंकर सिंह ने की, जबकि संचालन सीता संवाद आध्यात्मिक एवं साहित्यिक यात्रा के निदेशक आग्नेय कुमार ने किया।

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता साहित्यकार राजेंद्र सिन्हा ने माता सीता के जीवन चरित्र पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने माता सीता को नारी शक्ति का सर्वोत्तम आदर्श बताते हुए उनके त्याग, तपस्या, आत्मबल, निर्णय क्षमता और निडर व्यक्तित्व को प्रेरणादायी बताया।

श्री सीताराम महावीर मंदिर न्यास, तिलक ताजपुर के सचिव डॉ. लाल बाबू सिंह ने कार्यक्रम में पहुंचे सभी अतिथियों का अंगवस्त्र एवं माला पहनाकर स्वागत किया। इसके बाद श्री सीताराम भगवान के मंदिर में विधिवत पूजा-अर्चना और दीप प्रज्ज्वलन किया गया। उपस्थित लोगों ने भगवान को पुष्पांजलि भी अर्पित की।

कार्यक्रम में अतिथि परिचय एवं विचार गोष्ठी के लिए विषय प्रवेश संयोजक विमल कुमार परिमल ने कराया। उन्होंने मारुति मेधा सम्मान समारोह तथा ‘जनक सुता जगजननी जानकी’ विषय पर आयोजित विचार गोष्ठी की रूपरेखा प्रस्तुत की।

समारोह के दौरान ज्ञान भारती विद्यालय, रुन्नी सैदपुर की छात्राओं ने स्वागत गीत प्रस्तुत किया। छात्राओं ने रामचरितमानस के गिरिजा पूजन प्रसंग से संबंधित दोहों का भी पाठ किया।

माता सीता के त्याग और आत्मबल पर हुई चर्चा

समारोह के दूसरे सत्र में तुलसी जयंती के अवसर पर विचार गोष्ठी आयोजित की गई। इसमें ‘जनक सुता जगजननी जानकी’ विषय पर वक्ताओं ने विस्तार से अपने विचार रखे।

पूर्व प्राचार्य डॉ. त्रिविक्रम नारायण सिंह, अखिलेश्वर सिंह, कवि सुरेश वर्मा, कवि राम बाबू सिंह, सेवानिवृत्त शिक्षक शिव शंकर सिंह, माउंट फोर्ट स्कूल के निदेशक पप्पू कुमार, डीएवी दरभंगा के दीपेंद्र सिंह, मंदिर न्यास के सचिव डॉ. लाल बाबू सिंह, ज्ञान भारती विद्यालय रुन्नी सैदपुर के निदेशक राम भद्र सिंह, जय शंकर सिंह, दिलीप शाही, अजय कुमार सिंह, रत्नेश्वर सिंह सहित कई वक्ताओं ने माता सीता के जीवन और उनके व्यक्तित्व के विभिन्न पक्षों पर चर्चा की।

वक्ताओं ने कहा कि माता सीता का जीवन त्याग, तपस्या, निर्णय क्षमता, आत्मबल, निडरता, बुद्धिमत्ता और स्वाभिमान का प्रतीक है। जनक की पुत्री के रूप में धरती से प्रकट हुईं सीता ने राजमहल के सुखों के बीच जीवन बिताने के बजाय परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं को ढाला।

वक्ताओं के अनुसार, जनक की राजदुलारी, अवध की बहू और भगवान श्रीराम की अर्धांगिनी होने के बावजूद सीता ने अपने निर्णय स्वयं लिए। उन्होंने अपनी इच्छा से वनगमन का निर्णय लिया और कठिन परिस्थितियों में भी श्रीराम का साथ निभाया।

अशोक वाटिका में भी नहीं टूटा सीता का आत्मविश्वास

विचार गोष्ठी में वक्ताओं ने अशोक वाटिका में माता सीता के जीवन प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि विपरीत परिस्थितियों में भी उनका साहस और आत्मविश्वास कमजोर नहीं हुआ। उन्होंने रावण के सामने अपने आत्मसम्मान और पतिव्रत धर्म की मर्यादा को बनाए रखा।

वक्ताओं ने कहा कि माता सीता का चरित्र नारी के आत्मबल और दृढ़ इच्छाशक्ति का उदाहरण है। उन्होंने कठिन से कठिन परिस्थितियों का सामना सहजता से किया और अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया।

दूसरे वनवास के प्रसंग का उल्लेख करते हुए वक्ताओं ने कहा कि सीता ने वन देवी के समान जीवन जीते हुए लव-कुश का पालन-पोषण किया। महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में रहते हुए उन्होंने दोनों पुत्रों को शिक्षा, संस्कार और विभिन्न कलाओं में निपुण बनाया। उनका जीवन स्वाभिमान, स्वावलंबन और आत्मनिर्भरता का संदेश देता है।

वक्ताओं ने कहा कि माता सीता विपरीत परिस्थितियों में भी सहज रहने, मुस्कुराने, क्षमा करने और स्वावलंबी जीवन जीने की प्रेरणा देती हैं। उनका जीवन नारी को शिक्षा, ज्ञान, आत्मनिर्भरता और आत्मसम्मान के प्रति समर्पित रहने का संदेश देता है।

सीता के जीवन से पर्यावरण संरक्षण का संदेश

विचार गोष्ठी में यह भी कहा गया कि ‘जनक सुता से जगत जननी जानकी’ तक माता सीता की जीवन यात्रा केवल आध्यात्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि इसमें प्रकृति, वन, वन्यजीव और पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी निहित है।

वक्ताओं के अनुसार, माता सीता का वन जीवन प्रकृति और वन क्षेत्र के प्रति सम्मान, संरक्षण एवं संवर्धन की प्रेरणा देता है। उनके जीवन चरित्र से मिथिला और अवध दोनों की प्रतिष्ठा बढ़ी है। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीराम को मर्यादा पुरुषोत्तम राम के रूप में स्थापित करने में माता सीता की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही।

वक्ताओं ने कहा कि कन्या के रूप में जन्म लेकर पत्नी और बाद में माता के रूप में अपनी जिम्मेदारियों को पूर्ण करना जीवन की पूर्णता का प्रतीक है। माता सीता का जीवन नारी की शक्ति, धैर्य, निर्णय क्षमता और आत्मसम्मान का आदर्श प्रस्तुत करता है।

भक्ति संगीत से गूंजा समारोह

समारोह के दौरान सावन के महीने से जुड़े झूला, कजरी, भजन-कीर्तन और भक्ति गीतों की संगीतमय प्रस्तुति भी हुई। व्यास नवीन कुमार ने विनय पत्रिका गायन सहित विभिन्न भक्तिमय प्रस्तुतियों से कार्यक्रम को आध्यात्मिक वातावरण प्रदान किया। तबले पर मुरली उपाध्याय ने संगत की।

कार्यक्रम के अंत में श्री सीताराम महावीर मंदिर न्यास के सचिव डॉ. लाल बाबू सिंह ने सभी अतिथियों, वक्ताओं और उपस्थित लोगों के प्रति धन्यवाद, आभार एवं साधुवाद व्यक्त किया।

सभा के निर्णय के अनुसार नितेश कुमार और विधि कुमारी को मारुति मेधा सम्मान से सम्मानित किया गया। वहीं जागृति कुमारी को माता जानकी सम्मान प्रदान किया गया।

कार्यक्रम के समापन पर आयोजकों ने सभी सहयोगियों और उपस्थित लोगों का आभार व्यक्त किया।

आलेख: आग्नेय कुमार
निदेशक, सीता संवाद, सीतामढ़ी

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