मित्रों दो दिन से लगातार लोगों ने महाराष्ट्र के दिवंगत उप मुख्यमंत्री स्व अजीत पवार की विधवा सुनेत्रा पवार पर आलोचना और कटाक्ष की झड़ी लगा रखी है।
आलोचकों का कहना है कि सनातन धर्म में पति की मृत्यु के बाद तेरह दिन तक शौक मनाने का शास्त्रोक्त नियम है। इसी नियम के आधार पर आलोचकों का कहना है कि मृतक की पत्नी ने तेरह दिन तक शोक मनाने की बजाय पति की मृत्यु के तीसरे दिन ही उप मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण कर ली।

मित्रों इस सारे घटनाक्रम में केवल एक विधवा कसूरवार कैसे हो सकती है, जबकि उसको शपथ ग्रहण करवाने वाली सरकार और शपथ ग्रहण करवाने हेतु उपस्थित सभी मर्द प्रशासनिक अधिकारी सनातन धर्म के नियमों को बेहतर ढंग से जानते थे।
मित्रों आप इस बारे में इन महत्वपूर्ण पहलुओं पर विचार करके निष्कर्ष निकालें कि असल में गुनहगार कौन कौन है —

1.क्या महाराष्ट्र की हिंदूवादी सरकार विमान दुर्घटना के तीन दिन के अंदर ही जल्दबाजी में मृतक उपमुख्यमंत्री की विधवा को शपथग्रहण कराने हेतु समारोह का आयोजन करने के लिए कसूरवार नहीं है?
मित्रों महाराष्ट्र ही नहीं बल्कि केंद्र की बीजेपी सरकार को ही भारत की जनता इस दुर्घटना को लेकर कटघरे में खड़ा कर रही थी और बहुत से विपक्षी नेता जांच करवाए जाने की मांग कर रहे थे। अगर तेरह दिन शोक मनाया जाता तो दुर्घटना का मुद्दा और जांच की मांग तूल पकड़ती जाती। इसलिए केंद्र की हिंदूवादी बीजेपी सरकार ने दबाव बना कर शपथ ग्रहण करवा दिया ताकि जांच वाले विवाद का मुद्दा ही बदल जाए। तो कुसूर केंद्र की हिंदूवादी सरकार का भी तो हुआ?

2.दूसरी बात अजीत पवार की मृत्यु के बाद उसकी पार्टी के सांसदों को केंद्र सरकार की ईडी का डर था और पार्टी के टूटने का भय था, पार्टी के मर्द सांसदों के दबाव के कारण सुनेत्रा पवार को झुकना पड़ा और यह विवादास्पद निर्णय लेना पड़ा। यह एक विधवा का स्वतंत्र निर्णय नहीं था बल्कि पार्टी बचाने हेतु दबाव में लिया गया निर्णय था तो क्या ये सब मर्द सांसद गुनहगार नहीं है जिन्होंने अपनी स्वार्थ सिद्धि और डर के कारण सुनेत्रा पवार को तीसरे दिन ही शपथ लेने को मजबूर कर दिया।

  1. क्या शपथ ग्रहण करवाने वाली महाराष्ट्र सरकार की हिंदू सरकार गुनहगार नहीं है?, महाराष्ट्र सरकार को ऐसी क्या जल्दी थी कि पति की मृत्यु के तीसरे दिन ही विधवा सुनेत्रा पवार को शपथ ग्रहण करने के लिए मजबूर कर दिया। सुनेत्रा पवार खुद तो चलकर नहीं गई थी महाराष्ट्र सरकार के पास।

मित्रों जिस औरत ने हाल में ही अपना पति खोया है वो अपने दुःख में मानसिक रूप से कमजोर और असुरक्षित होकर अपने बच्चों और शुभचिंतकों के दबाव में उनकी इच्छानुसार कार्य करती है।
औरत हो या मर्द दुःख से उभरने के लिए लगभग एक दो सप्ताह का समय लग ही जाता है इसीलिए शास्त्रों में भी तेरह दिन का शोक बताया गया था। अगर तेरह दिन तक मामला लटक जाता तो सुनेत्रा पवार मानसिक रूप से उभर आतीं और शायद निर्णय कुछ और हो सकते थे जो केंद्र सरकार और महाराष्ट्र सरकार को रास ना आते। इसलिए सरकार के दबाव में दुख और शोक ग्रस्त महिला के आचरण पर ज्यादा कटाक्ष और आलोचना सही नहीं है।
क्योंकि सही मायने में तो आलोचना की वास्तविक हकदार महाराष्ट्र और केंद्र की बीजेपी सरकार ही है।

Share.
Leave A Reply

Exit mobile version