नई दिल्ली। भारतीय साहित्य, इतिहास, दर्शन और यात्रा-वृत्तांत के क्षेत्र में अमिट योगदान देने वाले महापंडित राहुल सांकृत्यायन एक ऐसे लेखक और विचारक थे, जिनकी पहचान केवल भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के अनेक देशों तक फैली हुई है। उनकी रचनाओं का कई भाषाओं में अनुवाद हुआ और उन्होंने इतिहास, दर्शन, धर्म, संस्कृति, साहित्य तथा यात्रा-वृत्तांत जैसे विविध विषयों पर 120 से अधिक पुस्तकें लिखीं और अनुवादित कीं।

भारत सरकार ने उनके बौद्धिक योगदान के लिए वर्ष 1963 में पद्मभूषण से सम्मानित किया था। इससे पहले उन्हें 1958 में साहित्य अकादमी पुरस्कार भी प्राप्त हुआ था। राहुल सांकृत्यायन एक प्रखर स्वतंत्रता सेनानी भी थे और ब्रिटिश शासन के दौरान कई बार जेल गए।

रानीगंज में मूर्ति गिराए जाने का दावा

हाल के दिनों में यह दावा किया गया है कि पश्चिम बंगाल के रानीगंज में स्थापित राहुल सांकृत्यायन की प्रतिमा को गिरा दिया गया। बताया जा रहा है कि यह प्रतिमा वर्ष 1994 में उनकी जन्मशती के अवसर पर स्थापित की गई थी।

इस घटना को लेकर सोशल मीडिया और विभिन्न बौद्धिक वर्गों में प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कई लोगों ने इसे सांस्कृतिक विरासत और महान साहित्यकारों के सम्मान से जुड़ा विषय बताया है।

विचारों को मिटाया नहीं जा सकता

राहुल सांकृत्यायन के जीवन और कार्यों को याद करते हुए यह कहा जा रहा है कि किसी विचारक की प्रतिमा को नुकसान पहुंचाया जा सकता है, लेकिन उसके विचारों और बौद्धिक विरासत को समाप्त नहीं किया जा सकता। उनके लेखन और चिंतन आज भी समाज को प्रगतिशील सोच और ज्ञान के प्रति प्रेरित करते हैं।

बताया गया है कि इस मामले पर उनके पुत्र प्रो. जेता सांकृत्यायन ने भी एक भावनात्मक वक्तव्य जारी किया है, जिसमें उन्होंने घटना पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की है।

नोट: इस समाचार में प्रतिमा गिराए जाने संबंधी जानकारी उपलब्ध दावे के आधार पर प्रस्तुत की गई है। संबंधित प्रशासन या अन्य आधिकारिक पक्ष की पुष्टि अथवा प्रतिक्रिया उपलब्ध होने पर उसे भी शामिल किया जाना चाहिए।

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