मध्य-पूर्व में तनाव चरम पर पहुंच चुका है, जहां ईरान पर संयुक्त राज्य अमेरिका और इजरायल की संयुक्त सैन्य कार्रवाई लगातार जारी है। इन हमलों में ईरान की न्यूक्लियर, मिलिट्री और लीडरशिप से जुड़ी रणनीतिक जगहों को प्राथमिकता के आधार पर निशाना बनाया जा रहा है।

अमेरिकी सेना के यूएस सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के अनुसार, ऑपरेशन के शुरुआती दो दिनों में ही 1250 से ज्यादा टारगेट्स पर हमले किए जा चुके हैं। यह आंकड़ा इस सैन्य कार्रवाई की व्यापकता और आक्रामकता को दर्शाता है।

अमेरिका ने स्पष्ट किया है कि केवल उन ठिकानों को टारगेट किया जा रहा है, जो क्षेत्रीय और वैश्विक सुरक्षा के लिए तत्काल खतरा पैदा कर सकते हैं। यानी यह ऑपरेशन एक प्री-एम्प्टिव स्ट्राइक (Pre-emptive Strike) के तौर पर देखा जा रहा है, जिसका उद्देश्य संभावित खतरों को पहले ही खत्म करना है।

वहीं, ईरान ने भी पुष्टि की है कि इन हमलों में नतांज न्यूक्लियर साइट को निशाना बनाया गया। नतांज ईरान के सबसे अहम यूरेनियम एनरिचमेंट केंद्रों में से एक है, जो लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय निगरानी में रहा है।

इस मामले में इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी (IAEA) ने भी स्थिति स्पष्ट की है। एजेंसी के अनुसार, नतांज साइट को कुछ भौतिक नुकसान जरूर हुआ है, लेकिन फिलहाल किसी भी तरह के रेडियोलॉजिकल लीक या परमाणु विकिरण के खतरे की संभावना नहीं है। यह बयान वैश्विक स्तर पर बढ़ती चिंता को कुछ हद तक कम करता है।

हालांकि, लगातार हो रहे इन हमलों से क्षेत्र में व्यापक अस्थिरता का खतरा बना हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह संघर्ष लंबा खिंचता है, तो इसका असर सिर्फ मध्य-पूर्व ही नहीं बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार, कूटनीतिक समीकरण और सुरक्षा ढांचे पर भी पड़ेगा।

फिलहाल, पूरी दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या यह सैन्य कार्रवाई सीमित दायरे में रहेगी या फिर एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध का रूप ले सकती है।

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