छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का हालिया फैसला सुनकर मेरा दिल दहल गया है। क्या सोचकर जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की बेंच ने एक पुराने मामले में कहा कि योनि के ठीक ऊपर लिंग रखकर वीर्यपात करना बलात्कार नहीं माना जाएगा, क्योंकि इसमें पूरा प्रवेश (पेनिट्रेशन) साबित नहीं हुआ। इस पर मेरी लेखनी से कुछ शब्द :-
🫢..अदालत की स्याही में डूबी चीख..🫢
छत्तीसगढ़ की अदालत में एक फैसला गिरा,
जैसे पत्थर पर चीख टकराई हो।
“योनि के ठीक ऊपर लिंग रखकर,
वीर्य बहा देना—बलात्कार नहीं,”
कहा जज ने, शब्दों को तराजू में तौलते हुए।
कानून की नाप में इंच-इंच मापा गया दर्द,
प्रवेश न हुआ तो अपराध अधूरा,
कोशिश भर ठहरा।
स्तन दबाए गए, नाड़ा खींचा,
बाहों में कसा, सांसें थामीं,
कपड़े फटे, चीख दबी—
पर “पूर्ण प्रवेश” न साबित हुआ,
तो इंसाफ ने आँखें मूँद लीं।
अब बेटियों को क्या समझाएँ?
कि तुम्हारा जख्म सही है,
पर धारा में फिट नहीं बैठा।
तुम्हारी रूह चीर गई,
पर कानून कहता है—शरीर में घुसना चाहिए था।
तुम्हारा डर, तुम्हारी रातें, तुम्हारी नींद का खौफ
ये सब गवाह नहीं बन पाए,
क्योंकि मापदंड सिर्फ “पेनिट्रेशन” का था।
फैसले की भाषा में संवेदना कहाँ खो गई?
कब इंसाफ इंच-गिनती बन गया?
जब आत्मा मर जाए,
पर किताब की परिभाषा न टूटे—
तो दरिंदा निर्दोष ठहरता है,
और पीड़िता को समझाना पड़ता है—
“कानूनन तुम्हारे साथ कुछ हुआ ही नहीं।”
सुनो, अदालतों—
बलात्कार सिर्फ देह में नहीं होता,
कभी फैसलों की ठंडी स्याही में भी होता है।
जब शब्द मानवता से कट जाते हैं,
तो औरत की अस्मिता कटती है सबसे पहले।
काश, कानून में दिल भी शामिल हो जाए…
काश, इंसाफ सिर्फ धारा न रहे,
एक जीती-जागती आवाज़ बन जाए।
काश कि समझा जाए…!
डॉ मंजु सैनी
गाजियाबाद
